Union Budget 2026: STT Hike से बाज़ार में हाहाकार! शेयर 1% से ज़्यादा गिरे, फिस्कल कंसॉलिडेशन पर ज़ोर

ECONOMY
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AuthorAditya Rao|Published at:
Union Budget 2026: STT Hike से बाज़ार में हाहाकार! शेयर 1% से ज़्यादा गिरे, फिस्कल कंसॉलिडेशन पर ज़ोर
Overview

Union Budget 2026, जो 1 फरवरी 2026 को पेश हुआ, में सरकार ने फिस्कल कंसॉलिडेशन और कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) पर फोकस किया है। हालांकि, फ्यूचर और ऑप्शंस (Futures & Options) पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में ज़बरदस्त बढ़ोतरी ने बाज़ार को चौंका दिया। इस फैसले के चलते प्रमुख सूचकांक (Benchmark Indices) **1%** से ज़्यादा टूट गए।

STT का झटका और बाज़ार में बिकवाली का दौर

Union Budget 2026 पेश होते ही शेयर बाज़ार में भारी गिरावट दर्ज की गई। Nifty 50 और Sensex दोनों 1% से ज़्यादा लुढ़क गए। इसकी मुख्य वजह फ्यूचर और ऑप्शंस (Derivatives) पर STT में की गई भारी बढ़ोतरी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स पर STT को 0.02% से बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया है। वहीं, ऑप्शंस प्रीमियम और ऑप्शंस के एक्सरसाइज पर STT को 0.1% और 0.125% से बढ़ाकर 0.15% तक पहुंचा दिया गया है। SEBI जैसे रेगुलेटर्स का मानना है कि यह कदम स्पेकुलेशन (Speculation) को कम करने और डेरिवेटिव सेगमेंट में रिटेल निवेशकों के भारी नुकसान को रोकने के लिए उठाया गया है। मगर ट्रेडर्स (Traders) इसे ट्रांजैक्शन कॉस्ट (Transaction Cost) में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा मान रहे हैं। इस फैसले का असर तुरंत दिखा, बजट वाले दिन ही निवेशकों की करीब ₹6 लाख करोड़ की संपत्ति का सफाया हो गया। ट्रेडिंग और एक्सचेंज से जुड़ी कंपनियों, जैसे BSE Ltd., पर इसका गहरा असर पड़ा और BSE के शेयर 15% तक गिर गए। बाज़ार में घबराहट साफ दिखी, Nifty VIX 14% से ज़्यादा उछल गया। यह बाज़ार की संवेदनशीलता को दर्शाता है, खासकर हाई-फ्रीक्वेंसी (High-Frequency) और रिटेल ट्रेडर्स के लिए जो लगातार डेरिवेटिव्स में नुकसान झेल रहे हैं।

फिस्कल कंसॉलिडेशन और इंफ्रा पर सरकारी खर्च

टैक्स में बदलाव पर बाज़ार की नकारात्मक प्रतिक्रिया के बावजूद, बजट ने फिस्कल डिसिप्लिन (Fiscal Discipline) के प्रति सरकार की मज़बूत प्रतिबद्धता जताई है। FY27 के लिए फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) को GDP के 4.3% तक लाने का लक्ष्य है, जो FY26 के अनुमानित 4.4% से कम है। यह सरकार के मीडियम-टर्म फिस्कल रोडमैप (Medium-Term Fiscal Roadmap) के अनुरूप है। डेट-टू-GDP रेश्यो (Debt-to-GDP Ratio) भी FY27 में घटकर 55.6% रहने का अनुमान है, जो FY26 में 56.1% था। निजी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Private Capex) में धीमी गति को देखते हुए, सरकार अपना खर्च बढ़ाने पर ज़ोर दे रही है। FY27 के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) ₹12.2 लाख करोड़ तय किया गया है, जो FY26 के अनुमान से 12% ज़्यादा है। पब्लिक इन्वेस्टमेंट (Public Investment) पर इस निरंतर फोकस का मकसद ग्रोथ को बढ़ाना और खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट (Infrastructure Development) के ज़रिए आर्थिक मज़बूती लाना है।

ग्लोबल अनिश्चितताओं के बीच सेक्टोरल फोकस

यह बजट ग्लोबल इकोनॉमिक अनिश्चितताओं, जैसे ट्रेड टेंशन्स (Trade Tensions) और संभावित टैरिफ वॉर्स (Tariff Wars) के बीच पेश किया गया है। इसके जवाब में, सरकार 'आत्मनिर्भर भारत' और घरेलू क्षमताओं को मज़बूत करने पर ज़ोर दे रही है। बजट में मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) को बढ़ावा देने के प्रावधान शामिल हैं, खासकर इमर्जिंग सेक्टर्स जैसे बायोफार्मास्यूटिकल्स (Biopharmaceuticals), केमिकल्स (Chemicals) और कैपिटल गुड्स (Capital Goods) में। 'बायोफार्मा शक्ति' स्कीम (Biopharma Shakti Scheme) और केमिकल पार्क्स (Chemical Parks) जैसी पहलों का ज़िक्र है। फॉरेन (Foreign) कंपनियों के लिए डेटा सेंटर्स (Data Centres) स्थापित करने पर टैक्स हॉलिडे (Tax Holiday) और रेयर अर्थ मिनरल माइनिंग (Rare Earth Mineral Mining) के लिए प्रोत्साहन भी इस रणनीति का हिस्सा हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में FY26 के लिए 7% की मज़बूत ग्रोथ का अनुमान है, हालांकि बजट में खपत (Consumption) बढ़ाने के लिए सीधे उपाय सीमित हैं, जो घरेलू मांग को देखते हुए चिंता का विषय हो सकता है। IT सेक्टर को भी सेफ हार्बर रूल्स (Safe Harbour Rules) में कुछ बदलावों से मदद मिलने की उम्मीद है।

उधार लेने की बड़ी चुनौती

एक अहम फिस्कल कदम FY27 के लिए ₹17.2 लाख करोड़ के ग्रॉस मार्केट बोर्रोइंग (Gross Market Borrowing) का प्रस्ताव है, जो पिछले साल से 16% ज़्यादा है। इसका एक बड़ा कारण बॉन्ड रिडेम्पशन्स (Bond Redemptions) का ज़्यादा होना है। यह रिकॉर्ड बोर्रोइंग प्रोग्राम बॉन्ड मार्केट की एब्जॉर्प्शन कैपेसिटी (Absorption Capacity) के लिए एक चुनौती पेश करता है, जिसमें रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के हस्तक्षेप और अर्थव्यवस्था में इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) पर दबाव पड़ने की संभावना है। सरकार फिस्कल कंसॉलिडेशन के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इस बड़े बोर्रोइंग की ज़रूरत को वित्तीय बाज़ारों पर ज़्यादा दबाव डाले बिना सावधानी से मैनेज करना होगा।

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