बजट का मुख्य मकसद: सट्टेबाजी पर रोक, लॉन्ग-टर्म निवेश को बढ़ावा
सरकार के इस नए फैसले का मुख्य उद्देश्य सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड्स (SGBs) में होने वाली सट्टेबाजी (speculative trading) और आर्बिट्रेज (arbitrage) जैसी गतिविधियों पर लगाम कसना है। बजट 2026 में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि टैक्स में छूट का लाभ केवल उन निवेशकों को मिलेगा जो सीधे सरकारी योजना के तहत बॉन्ड खरीदकर लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं। यह बदलाव उन निवेशकों को प्रभावित करेगा जो सेकेंडरी मार्केट से SGBs खरीदते और बेचते हैं, क्योंकि अब उन्हें मुनाफा होने पर कैपिटल गेन्स टैक्स का भुगतान करना होगा। सरकार चाहती है कि SGBs को सिर्फ एक सरकारी ऋण साधन (government debt instrument) के तौर पर देखा जाए जिसमें लंबी अवधि का निवेश हो।
SGBs: क्या थे असली मकसद और क्यों हुए बंद?
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड्स को पहली बार नवंबर 2015 में लॉन्च किया गया था। इसका एक बड़ा मकसद भारत को फिजिकल गोल्ड के आयात पर अपनी निर्भरता कम करना था, क्योंकि सोने का आयात देश के व्यापार घाटे (trade deficit) को बढ़ाने वाला एक प्रमुख कारक रहा है। ये बॉन्ड 2.5% प्रति वर्ष का निश्चित ब्याज देते थे, साथ ही सोने की कीमत बढ़ने पर अतिरिक्त लाभ भी मिलता था। इन्हें 8 साल की मैच्योरिटी अवधि के साथ पेश किया गया था। हालांकि, बढ़ती सोने की कीमतों और उस पर दिए जाने वाले ब्याज के कारण सरकार पर लागत का बोझ बढ़ने लगा, जिसके चलते 2024 के आसपास नए SGBs की फ्रेश इश्यूअंस को बंद कर दिया गया।
सोने की महंगाई और बढ़ता व्यापार घाटा: बैकग्राउंड
यह नीतिगत बदलाव ऐसे समय में आया है जब वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और सुरक्षित निवेश की मांग के चलते सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में से एक है, और सोने का भारी आयात ऐतिहासिक रूप से देश के चालू खाता घाटे (current account deficit) को बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए, फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के पहले नौ महीनों में, सोने का आयात देश के व्यापार असंतुलन में एक महत्वपूर्ण कारक रहा।
सेकेंडरी मार्केट पर असर और निवेशकों की नई रणनीति
सेकेंडरी मार्केट में SGBs की खरीद पर टैक्स छूट हटने से सट्टेबाजी की गतिविधियों पर अंकुश लगने की उम्मीद है। इससे लिस्टेड बॉन्ड्स पर देखे जाने वाले प्रीमियम (premiums) में भी नरमी आ सकती है। वे निवेशक जो पहले सेकेंडरी मार्केट से SGBs खरीदकर टैक्स-फ्री मैच्योरिटी का फायदा उठाते थे, अब उन्हें अपने निवेश की रणनीति बदलनी होगी और कैपिटल गेन्स टैक्स को ध्यान में रखना होगा। इस बदलाव से मौजूदा SGBs की लिक्विडिटी (liquidity) और ट्रेडिंग पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि आर्बिट्रेज के अवसर कम हो जाएंगे।
आगे क्या?
बजट में किया गया यह समायोजन सख्त राजकोषीय अनुशासन (fiscal discipline) की ओर इशारा करता है और इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि टैक्स इंसेंटिव सीधे दीर्घकालिक निवेश के उद्देश्यों का समर्थन करें। निवेशकों के लिए, यह SGBs का मूल्यांकन केवल टैक्स आर्बिट्रेज के अवसरों के बजाय उनके सीधे यील्ड (yield) और हेजिंग (hedging) क्षमताओं के आधार पर करने के महत्व को रेखांकित करता है।