वैश्विक बाज़ारों की शुरुआत थोड़ी धीमी रही, जहाँ ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें **3%** से ज़्यादा उछलकर **$90** प्रति बैरल के पार निकल गईं। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों के चलते तेल की कीमतों में यह तेज़ी आई है, जिसने एक बार फिर वैश्विक बाज़ारों में महंगाई (Inflation) की चिंताओं को बढ़ा दिया है।
भारत पर क्या होगा असर?
यह बढ़ोतरी भारतीय निवेशकों के लिए ख़ास मायने रखती है। भारत अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर कच्चा तेल (Crude Oil) आयात करता है। ऐसे में, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) पर पड़ता है। साथ ही, यह घरेलू बाज़ार में महंगाई को भी बढ़ा सकता है, जिससे आम आदमी और कंपनियों, दोनों की लागत बढ़ेगी।
बढ़ती तेल कीमतों और बॉन्ड यील्ड्स का डबल अटैक
ऊपर से तेल की कीमतों में आई तेज़ी, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी 30-साल के ट्रेजरी यील्ड्स (Treasury Yields) का 5.0% के ऊपर जाना, निवेशकों के लिए दोहरी चुनौती पेश कर रहा है। जब बॉन्ड यील्ड्स बढ़ते हैं, तो वे अक्सर शेयरों, खासकर टेक्नोलॉजी जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर के लिए ज़्यादा आकर्षक और सुरक्षित विकल्प बन जाते हैं। ऐसे में, कंपनियों के लिए अपनी मौजूदा शेयर कीमतों को सही ठहराने के लिए दमदार नतीजे पेश करना ज़रूरी हो जाता है। निवेशक इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या कंपनियां बढ़ती ऊर्जा लागत और ऊंची ब्याज दरों के माहौल में अपने मुनाफे (Profit Margins) को बनाए रख पाएंगी।
टेक्नोलॉजी सेक्टर पर बड़ा इम्तिहान
हाल के दिनों में बाज़ार की तेज़ी का मुख्य आधार रहे टेक्नोलॉजी सेक्टर पर इस हफ़्ते बड़ा इम्तिहान होगा। Alphabet, Intel और Tesla जैसी दिग्गज कंपनियां अपने तिमाही नतीजे पेश करने वाली हैं। पिछले हफ़्ते फिलाडेल्फिया सेमीकंडक्टर इंडेक्स (Philadelphia Semiconductor Index) में 10% की गिरावट आई थी, जो कि जून के अपने उच्चतम स्तर से 20% नीचे है। ऐसे में, अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मांग उम्मीद के मुताबिक वित्तीय नतीजों में तब्दील होती नहीं दिखती, तो यह सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी से जुड़े शेयरों में और भी ज़्यादा अस्थिरता ला सकता है।
एशियाई बाज़ारों का हाल
एशियाई बाज़ारों में शुरुआती कारोबार में थोड़ी घबराहट दिखी। जापान और दक्षिण कोरिया के इंडेक्स पर हालिया टेक-सेल-ऑफ (Tech-Sell-off) का असर नज़र आया। दक्षिण कोरियाई बाज़ार, जो ग्लोबल चिप निर्माताओं पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, इन रुझानों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। वहीं, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (US Federal Reserve) के अगले कदम को लेकर भी बाज़ार में अनिश्चितता बनी हुई है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ब्याज दरें उतनी तेज़ी से नीचे नहीं आ सकतीं जितनी उम्मीद की जा रही थी। अब सबकी नज़रें यूरोपीय सेंट्रल बैंक (European Central Bank) की आने वाली मीटिंग पर हैं, यह देखने के लिए कि क्या वे मौजूदा ब्याज दरों को बनाए रखेंगे, खासकर तब जब तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने महंगाई को कम करने की राह को और मुश्किल बना दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि टेक कंपनियां बढ़ती लागत का सामना कैसे करती हैं और क्या उनके भविष्य के नतीजों का अनुमान बाज़ार की मौजूदा वैल्यूएशन (Valuation) की स्थिरता को लेकर चिंता को कम कर पाएगा।
