Bond Yields का तूफान: ईरान टेंशन, कच्चे तेल का धमाका और पॉलिसी का खेल, बॉन्ड यील्ड्स में भारी उछाल!

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
Bond Yields का तूफान: ईरान टेंशन, कच्चे तेल का धमाका और पॉलिसी का खेल, बॉन्ड यील्ड्स में भारी उछाल!
Overview

बढ़ती महंगाई की आशंकाओं और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के चलते दुनियाभर के बॉन्ड मार्केट्स में यील्ड्स (Yields) तेजी से बढ़ रहे हैं। इस माहौल में निवेशक अपनी बॉन्ड स्ट्रैटेजी पर फिर से विचार कर रहे हैं।

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बॉन्ड यील्ड्स में आई तूफानी तेजी

यह पिछले एक महीने में बॉन्ड मार्केट्स के लिए सबसे खराब हफ्ता साबित हो रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में यील्ड्स के तेजी से चढ़ने का असर दिख रहा है। यूएस ट्रेजरी (US Treasury) के 2-साल वाले बॉन्ड पर यील्ड 12 बेसिस पॉइंट बढ़कर 3.83% तक पहुंच गई है। वहीं, यूके (UK) के 2-साल वाले बॉन्ड यील्ड में 30 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी देखी गई है, जो अब 4.42% पर है। जर्मन 2-साल वाले बॉन्ड यील्ड लगभग 2.55% के स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। इस बिकवाली (sell-off) की मुख्य वजह यह चिंता है कि ऊर्जा आपूर्ति में लगातार रुकावटें महंगाई को ऊंचा बनाए रख सकती हैं।

कच्चे तेल में आग, जियोपॉलिटिकल टेंशन का असर

कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $105.17 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, और यह हफ्ते की सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त की ओर बढ़ रहा है। जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम (Geopolitical Risk Premium) एनर्जी मार्केट्स को पूरी तरह से प्रभावित कर रहा है। ट्रेडर्स फिलहाल संभावित सप्लाई डिसरप्शन्स (supply disruptions) पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं, न कि कन्फर्म्ड शॉर्टफॉल्स (confirmed shortfalls) पर।

सेंट्रल बैंकों की अलग-अलग राह

सेंट्रल बैंक ब्याज दरों (Interest Rates) पर अलग-अलग राह पर चल रहे हैं, जो मार्केट्स के लिए बड़ी बात है। अमेरिकन फेडरल रिजर्व (Federal Reserve), हालांकि महंगाई के दबाव को स्वीकार कर रहा है और ग्रोथ व महंगाई के अनुमानों को बढ़ा रहा है, लेकिन उम्मीद है कि वह अपने फेडरल फंड्स रेट को फिलहाल 3.50%-3.75% के स्तर पर स्थिर रखेगा। साल के अंत तक केवल एक बार रेट कट (rate cut) का अनुमान लगाया जा रहा है। इसके विपरीत, यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) को बढ़ी हुई महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। मार्केट्स इस साल लगभग दो बार रेट हाइक्स (rate hikes) की उम्मीद कर रहे हैं, जो शायद जून में शुरू हो सकते हैं। इसी तरह, बैंक ऑफ इंग्लैंड (Bank of England) के आउटलुक में भी बदलाव आया है। पहले जहां रेट कट की उम्मीद थी, वहीं अब साल के अंत तक एक बार बढ़त की आशंका जताई जा रही है, भले ही उनका मौजूदा रेट 3.75% पर बना हुआ है। पॉलिसी में यह अंतर (policy divergence) ग्लोबल फाइनेंशियल माहौल को जटिल बना रहा है।

महंगाई की चिंता बनी हुई है

महंगाई (Inflation) एक गंभीर चिंता बनी हुई है, और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में इसके रास्ते अलग-अलग हैं। यूरो जोन (Eurozone) में साल के मध्य तक महंगाई 2% के आसपास आ सकती है। लेकिन अमेरिका में 2026 के अंत तक महंगाई 4% को पार कर सकती है। अमेरिका में महंगाई बढ़ने की वजह पिछले टैरिफ (tariffs), बढ़ता बजट घाटा, टाइट जॉब मार्केट और बढ़ती महंगाई की उम्मीदें हैं। ग्लोबल कोर इन्फ्लेशन (Global core inflation) 2026 में 2.8% पर स्थिर रहने का अनुमान है, लेकिन क्षेत्रों के हिसाब से इसमें काफी अंतर होगा। ब्लैक रॉक (BlackRock) के वेई ली (Wei Li) का कहना है कि तनाव कम होने पर भी, कई रेट कट्स का माहौल वापस आने की संभावना नहीं है, क्योंकि तनाव से पहले ही महंगाई चिंताजनक स्तर पर थी। लगातार बनी हुई महंगाई, सप्लाई शॉक्स (supply shocks) के साथ मिलकर, सेंट्रल बैंकों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर रही है।

मार्केट के जोखिम और आगे की राह

फिलहाल मार्केट्स में जो रीप्राइसिंग (repricing) हो रही है, वह छुपे हुए जोखिमों (risks) को उजागर करती है, जिससे मार्केट की अस्थिरता बढ़ सकती है। सेंट्रल बैंकों की अलग-अलग पॉलिसी, खासकर फेड और यूरोपीय बैंकों के बीच, महंगाई को कंट्रोल करते हुए आर्थिक ग्रोथ को नुकसान पहुंचाए बिना इसे मैनेज करना और मुश्किल बना रही है। इस बात का एक बड़ा खतरा है कि अमेरिका में महंगाई उम्मीद से ज्यादा जिद्दी साबित हो सकती है। यह लगातार बनी हुई महंगाई, जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के साथ मिलकर, दुनियाभर में बड़े रेट कट्स की गुंजाइश को कम कर रही है, जिससे 'लंबी अवधि तक ऊंची ब्याज दरें' (higher interest rates for longer) वाला नरेटिव और मजबूत हो रहा है। मार्केट की मौजूदा संवेदनशीलता (sensitivity) बताती है कि सप्लाई में कोई भी और रुकावट या महंगाई के अप्रत्याशित आंकड़े मार्च जैसी वोलेटिलिटी (volatility) को फिर से ला सकते हैं। आने वाले हफ्तों में अमेरिका, यूरोप, जापान, यूके और कनाडा के सेंट्रल बैंकों की मीटिंग्स पर बारीकी से नजर रखी जाएगी, ताकि इस मुश्किल स्थिति में पॉलिसी की दिशा के बारे में और संकेत मिल सकें।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.