जमीन और भ्रष्टाचार से जूझ रही पश्चिम बंगाल की इकोनॉमी
पश्चिम बंगाल में हाल के राजनीतिक बदलावों ने आर्थिक सुधार की उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज़्यादा जटिल है। राज्य की इकोनॉमी (Economy) गहरी, पुरानी संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रही है, जो किसी भी साधारण पॉलिसी (Policy) बदलाव से कहीं परे हैं।
राष्ट्रीय रुझानों से अलग चाल
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद निवेशकों की भावना में उछाल के बावजूद, पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था राष्ट्रीय विकास के पैटर्न से अलग दिशा में जा रही है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में राज्य की हिस्सेदारी 1960 के दशक के 10% से घटकर 2024 तक करीब 5.6% रह गई है। इसकी तुलना में गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य आर्थिक पावरहाउस बन गए हैं, जिन्होंने दशकों से पश्चिम बंगाल को पीछे छोड़ दिया है। वहीं, राज्य की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) राष्ट्रीय औसत के मुकाबले तेजी से गिरी है; 1960 में यह राष्ट्रीय औसत से 27% ज़्यादा थी, जो 2024 तक 16% कम हो गई।
विकास की राह में गहरे रोड़े
राज्य के आर्थिक ठहराव के पीछे मुख्य रूप से गहरी जड़ें जमा चुकी संरचनात्मक समस्याएं हैं। ब्रिटिश-काल के 'परमानेंट सेटलमेंट' की विरासत के चलते सदियों से चली आ रही जमीन के मालिकाना हक़ की जटिलताएं और विवाद। यह जटिलता हाईवे और रेलवे विस्तार जैसी महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में देरी का कारण बनती है, जिससे लागत बढ़ जाती है और बड़े पैमाने पर इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट (Industrial Investment) के लिए निवेशक हिचकिचाते हैं।
जमीन संबंधी इन मुद्दों के अलावा, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार भी एक बड़ी समस्या है। 'सिंडिकेट' ऑपरेशन, जिसमें राजनीतिक रूप से जुड़े समूह व्यवसायों को ऊंची कीमतों पर और घटिया क्वालिटी का सामान खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, और सरकारी सेवाओं के लिए 'कट-मनी' की मांग, अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालती है। जानकारों का कहना है कि इन भ्रष्ट प्रथाओं से कारोबार का मूल्य 15-20% तक कम हो सकता है और ट्रांजैक्शन कॉस्ट (Transaction Cost) 5-10% तक बढ़ सकती है।
पश्चिम बंगाल ने 1990 के दशक की आईटी क्रांति (IT Revolution) जैसी महत्वपूर्ण आर्थिक बदलावों को भी गंवा दिया। जबकि दक्षिणी शहरों ने तेजी से टेक हब (Tech Hub) बनाए, राज्य का माहौल - जिसमें मज़बूत यूनियनिज़्म (Unionism) और एंटी-बिज़नेस पॉलिसी (Anti-business Policies) की धारणा शामिल थी - ने टेक निवेश को हतोत्साहित किया। इससे संभावित नौकरियों और आर्थिक विविधीकरण (Economic Diversification) का भारी नुकसान हुआ।
आगे का जोखिम
पश्चिम बंगाल का आर्थिक भविष्य जोखिम भरा है। जमीन की अत्यधिक विखंडन (Fragmentation) और भ्रष्टाचार की गहराई को देखते हुए, केवल प्रशासनिक सुधार पर्याप्त नहीं हो सकते हैं। पिछले शासक दल के नेताओं का विपक्ष में शामिल होना इस चिंता को बढ़ाता है कि नई राजनीतिक व्यवस्था के तहत भी भ्रष्टाचार के नेटवर्क जारी रह सकते हैं। अतीत में, राज्य की इंडस्ट्रियल पॉलिसी अक्सर यूनियन बनाने पर ज़ोर देती थी, जिससे 'घेराव' की संस्कृति बनी, जिसने प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (Private Investment) को हतोत्साहित किया और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (Information Technology) जैसे क्षेत्रों में अवसरों का नुकसान हुआ।
भविष्य का नज़रिया
विश्लेषकों को पश्चिम बंगाल की इकोनॉमी में मुश्किल से रिकवरी की उम्मीद है। कुछ लोग निवेश के माहौल में मामूली सुधार की भविष्यवाणी करते हैं, जो प्रभावी गवर्नेंस (Governance) और रिफॉर्म्स (Reforms) पर निर्भर करेगा, लेकिन अनुमान बताते हैं कि राज्य की जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) निकट भविष्य में राष्ट्रीय औसत से कम रहने की संभावना है, संभवतः 6-7% के आसपास। टिकाऊ, उच्च-प्रभाव वाली ग्रोथ हासिल करने के लिए राजनीतिक स्थिरता, जमीन के मालिकाना हक़ की जटिलताओं और व्यापक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। प्रशासन के सामने दशकों के आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति और इनोवेटिव सॉल्यूशंस (Innovative Solutions) की ज़रूरत वाला एक बड़ा काम है।
