एशियाई जलवायु विशेषज्ञों की महत्वाकांक्षी योजनाएं, जो 2030 तक जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) को पूरी तरह बंद करने पर जोर दे रही हैं, सीधे तौर पर मौजूदा वैश्विक ऊर्जा बाजार की हकीकत से टकरा रही हैं।
मार्च 2026 में कुआलालंपुर घोषणा (Kuala Lumpur Declaration) के तहत एशियाई जलवायु विशेषज्ञों ने एक बड़ा ऐलान किया है। उनकी मांग है कि 2030 तक जीवाश्म ईंधन को फेज-आउट (Phase-out) करने के लिए 5.1 से 6.8 ट्रिलियन डॉलर का भारी-भरकम फंड जुटाया जाए। लंबी अवधि में यह राशि सालाना 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने की बात कही गई है। हालांकि, वैश्विक ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) में निवेश 2025 में मात्र 2.3 ट्रिलियन डॉलर ही रहा है, जो इस मांग के मुकाबले बहुत कम है।
इस मांग और हकीकत के बीच का अंतर तब और बढ़ जाता है जब हम मौजूदा बाजार को देखते हैं। मध्य पूर्व और वेनेजुएला जैसे क्षेत्रों में भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी उछाल आया है। इस उछाल ने बड़ी तेल और गैस कंपनियों की कमाई को बढ़ाया है, और 2026 में अब तक (22 मार्च तक) S&P 500 इंडेक्स में एनर्जी सेक्टर 30.70% की बढ़त के साथ सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला क्षेत्र बन गया है।
दूसरी ओर, नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के विकास में बाधाएं आ रही हैं। अमेरिका में 'One Big Beautiful Bill Act' के तहत 2026 के मध्य तक टैक्स क्रेडिट (Tax Credits) को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने जैसी नीतिगत बदलाव और ग्रिड इंटीग्रेशन (Grid Integration) की समस्याएं, जैसे कि भारी इंटरकनेक्शन कतारें, इसकी राह मुश्किल बना रही हैं।
केवल जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाना ही काफी नहीं है, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (Adaptation) के लिए भी भारी फंड की जरूरत है। अनुमान है कि विकासशील देशों को 2035 तक सालाना 310 से 365 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी, जबकि 2023 में उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त से केवल 26 अरब डॉलर ही मिले। इसके अलावा, लॉस एंड डैमेज (Loss and Damage) फंड के लिए शुरुआती आवंटन 2026 के अंत तक पायलट फेज के लिए महज़ 250 मिलियन डॉलर है, जो कि जरूरत के अनुमानित 400 अरब डॉलर सालाना से बहुत कम है।
हालांकि, यह उम्मीद की जा रही है कि 2025-2026 तक नवीकरणीय ऊर्जा कोयले को बिजली के सबसे बड़े स्रोत के रूप में पीछे छोड़ देगी, लेकिन परमिट में देरी, सप्लाई चेन की दिक्कतें और नीतिगत अनिश्चितताएं इसके विकास को धीमा कर रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बढ़ती बिजली की मांग भी ग्रिड पर दबाव डाल रही है। बेस लोड पावर और औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता अभी भी बहुत गहरी है, जिससे घोषणा में मांगी गई तेज चरणबद्ध समाप्ति एक बड़ी आर्थिक और ढांचागत चुनौती है।
2026 में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और भी जटिल हो गया है। AI-संचालित मांग, ग्रिड एकीकरण की चुनौतियां और नीतिगत अस्थिरता जैसे कई पहलू एक साथ काम कर रहे हैं, जो अवसर और जोखिम दोनों पैदा कर रहे हैं। भू-राजनीतिक कारक निकट और मध्यम अवधि में जीवाश्म ईंधन की कीमतों को सहारा दे रहे हैं, जिससे तेजी से डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) के लक्ष्य मुश्किल हो रहे हैं। इन सभी संक्रमणों की अंतिम सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकारें और निजी क्षेत्र भारी वित्तीय अंतराल को कैसे पाटते हैं और ऊर्जा सुरक्षा, सामर्थ्य और जलवायु कार्रवाई की परस्पर विरोधी मांगों को कैसे संतुलित करते हैं।