तेल संकट का डर! मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा, एशिया में महंगाई और शेयर बाजार में गिरावट की चिंता

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
तेल संकट का डर! मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा, एशिया में महंगाई और शेयर बाजार में गिरावट की चिंता
Overview

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत की खबरों के बीच कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड **$78** प्रति बैरल के पार चला गया है, जिससे एशियाई शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। निवेशक सुरक्षित ठिकानों की ओर भाग रहे हैं।

भू-राजनीतिक झटके से ग्लोबल मार्केट में उथल-पुथल

मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को झकझोर दिया है। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खमेनेई की मौत की खबरों और जहाजों पर हुए हमलों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त तेजी आई है। सोमवार, 2 मार्च 2026 को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर $77 प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहे थे, जो पिछले शुक्रवार के $72.87 प्रति बैरल के मुकाबले काफी ऊंची छलांग है। इस घटनाक्रम के कारण एशियाई शेयर बाजारों में व्यापक गिरावट देखी गई। जापान का Nikkei 225 इंडेक्स 2.4% तक गिर गया, जबकि हांगकांग का Hang Seng Index 1.7% से अधिक लुढ़क गया। इसके विपरीत, सोने की कीमतों में 2.8% का उछाल आया और यह $5,397 प्रति औंस पर पहुंच गया। निवेशकों ने डॉलर जैसी सुरक्षित संपत्तियों का रुख किया।

एशिया पर सबसे ज्यादा मार, महंगाई का खतरा बढ़ा

एशिया की विकसित अर्थव्यवस्थाएं मध्य पूर्व की अस्थिरता से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली हैं। जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और हांगकांग जैसी उच्च-आय वाली अर्थव्यवस्थाएं अपनी 80% से अधिक ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। विश्लेषकों का कहना है कि एशिया पर इसका असर सबसे ज्यादा इसलिए है क्योंकि मध्य पूर्व से तेल और गैस निर्यात का एक बड़ा हिस्सा यहीं आता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण जलमार्ग से वैश्विक समुद्री तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की शिपमेंट का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है, जो एशियाई बाजारों के लिए महत्वपूर्ण है। 2024 में, इस जलमार्ग से गुजरने वाले तेल का 84% और एलएनजी का 83% हिस्सा चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के लिए था। इस सीधी निर्भरता का मतलब है कि ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर एशिया में महंगाई (Inflation) को बढ़ाएंगी। ऐसे में, कई केंद्रीय बैंकों (Central Banks) को अपनी ब्याज दर (Interest Rate) नीतियों पर फिर से विचार करना पड़ सकता है, जो शायद दरें घटाने की सोच रहे थे।

उभरते बाजारों पर कर्ज का बोझ और ढांचागत कमजोरियां

यह भू-राजनीतिक संकट कई एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की पहले से मौजूद ढांचागत कमजोरियों (Structural Weaknesses) को और बढ़ा रहा है। विकसित देशों को आयात बिल बढ़ने से अपने व्यापार घाटे (Trade Deficit) का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, उभरते एशियाई बाजारों (Emerging Asian Economies) के लिए, बढ़ती वस्तुओं की लागत से बाहरी ऋण (External Debt) का दबाव फिर से बढ़ सकता है। महंगाई बढ़ने से श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में संप्रभु ऋण (Sovereign Debt) को लेकर चिंताएं फिर से उभर सकती हैं। OPEC+ देशों ने अप्रैल के लिए उत्पादन में 206,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि पर सहमति जताई है, लेकिन यह मौजूदा संकट को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। बीमा संबंधी चिंताओं के कारण कई बड़े टैंकर मालिकों और तेल कंपनियों ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से शिपमेंट निलंबित कर दिया है। ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत ने जोखिम को और बढ़ा दिया है।

भविष्य की राह: अनिश्चितता और महंगाई का सामना

मध्य पूर्व में इस संघर्ष के कारण 2026 के लिए वैश्विक महंगाई के अनुमानों, जो पहले करीब 2.8% रहने का अनुमान था, को अब काफी हद तक बढ़ाना पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतों में आगे भी उच्च अस्थिरता (Volatility) बने रहने की आशंका है। विश्लेषकों का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड $90 से $115 प्रति बैरल के बीच या गंभीर स्थिति में इससे भी ऊपर जा सकता है। यह बढ़ी हुई ऊर्जा लागत वैश्विक आर्थिक सुधार के लिए एक बड़ी बाधा बनेगी, जो मांग को कम कर सकती है। साथ ही, केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को बनाए रखने के बीच संतुलन साधना एक कठिन चुनौती होगी।

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