मंहगाई के पीछे की कहानी
अप्रैल की महंगाई रिपोर्ट एक मिली-जुली तस्वीर पेश करती है। जहां एक ओर ऊर्जा और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में तेज उछाल भू-राजनीतिक तनावों का सीधा असर दिखा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ प्रमुख खचरें के आंकड़ों में आई खास विसंगतियों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये मंहगाई उम्मीद से ज्यादा वक्त तक बनी रह सकती है।
मुख्य कारण और उपभोक्ताओं पर असर
ऊर्जा और खाद्य पदार्थों के दाम में भारी इजाफा
अप्रैल में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में सालाना आधार पर 3.8% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो कि 2023 के बाद की सबसे तेज रफ्तार है। पिछले महीने की तुलना में इसमें 0.6% की तेजी आई। इस उछाल की मुख्य वजहें थीं कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी बढ़ोतरी, जो कि भू-राजनीतिक तनावों के चलते सप्लाई चेन में आई रुकावटों से जुड़ी हैं। गैसोलीन (पेट्रोल) की कीमतों में अकेले अप्रैल में 5.4% का इजाफा हुआ, जबकि पिछले साल के मुकाबले यह 28.4% तक महंगी हो गई। इसी तरह, किराने के सामानों के दाम भी महीने-दर-महीने 0.7% बढ़े, खासकर मांस, डेयरी और सब्जियों के दाम। यह संकेत है कि कीमतों पर दबाव अब बढ़ने लगा है।
किराए के डेटा में गड़बड़ी से कोर इंफ्लेशन प्रभावित
खाद्य और ऊर्जा को छोड़कर, यानी कोर CPI में सालाना 2.8% और महीने-दर-महीने 0.4% की बढ़ोतरी हुई, जो अनुमान से थोड़ी ज्यादा है। इस आंकड़े में एक अहम कारण किराए के डेटा में आई एक अनोखी विसंगति है। 2025 में सरकारी शटडाउन के चलते, डेटा कलेक्शन में दिक्कत आई, जिससे किराए का डेटा पिछले साल अप्रैल 2025 से लिया गया था। जब यह डेटा अप्रैल 2026 में शामिल हुआ, तो इसने एक साल के किराए के इजाफे को एक साथ दिखा दिया, जिससे मासिक किराया सूचकांक में 0.6% का कृत्रिम उछाल आ गया। हालांकि, इस गड़बड़ी के बावजूद, एयरलाइन किराए और होटल की कीमतों में भी महीने-दर-महीने 2.8% की बढ़ोतरी हुई, जो कि आम उपभोक्ताओं के लिए चिंता का विषय है।
उपभोक्ताओं पर बढ़ता दबाव, रेट कट की उम्मीदें हुईं धूमिल
उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले असर का एक बड़ा पैमाना है 'वास्तविक औसत प्रति घंटा आय' (real average hourly earnings) में गिरावट। तीन साल में पहली बार, अप्रैल में वास्तविक वेतन में सालाना आधार पर 0.3% की गिरावट आई है। यानी, लोगों की खरीदने की क्षमता घट गई है। इस बढ़ती महंगाई और घटते वेतन से आम आदमी की जेब पर दबाव साफ दिख रहा है।
इस स्थिति का असर फाइनेंशियल मार्केट्स पर भी पड़ा है। स्टॉक फ्यूचर्स और ट्रेजरी की कीमतों में गिरावट देखी गई। अब मार्केट एक्सपर्ट्स यह मान रहे हैं कि फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरें घटाए जाने की उम्मीदें काफी कम हो गई हैं। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) और बार्कलेज (Barclays) जैसे ब्रोकरेज फर्मों का अनुमान है कि फेड शायद 2026 के अंत या 2027 तक ही दरें घटाएगा।
लंबी अवधि के रुझान और फेड का रुख
एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेल की ऊंची कीमतें भले ही मध्य पूर्व में शांति होने के बाद भी बनी रहेंगी, जिससे ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ेगी। इससे सामानों और सेवाओं की कीमतें ऊंची रहेंगी। हवाई किराए में बढ़ोतरी और उर्वरक की ऊंची कीमतों से सब्जियों के दाम बढ़ने की आशंका है। ऊर्जा की कीमतों में लगातार इजाफा आम उपभोक्ताओं को गैर-जरूरी चीजों पर खर्च कम करने पर मजबूर कर सकता है, जो कि घटते वास्तविक वेतन के चलते और भी गंभीर हो सकता है।
फेडरल रिजर्व जिस महंगाई दर (PCE price index) पर सबसे ज्यादा नजर रखता है, उसके आंकड़े भी करीब 3% रहने का अनुमान है, जो फेड के 2% के लक्ष्य से काफी ऊपर है। इससे यह साफ है कि फेड का मुख्य ध्यान महंगाई को कंट्रोल करने पर ही रहेगा, जिसके चलते ब्याज दरें ऊंची बनी रह सकती हैं।
मुख्य जोखिम और फेड की चुनौती
सबसे बड़ा जोखिम यह है कि महंगाई का दबाव अस्थायी न होकर बना रहे और ऊर्जा संकट से आगे बढ़कर अन्य क्षेत्रों में भी फैल जाए। वास्तविक वेतन में गिरावट का मतलब है कि उपभोक्ताओं के पास बढ़ती कीमतों को झेलने की क्षमता कम है, जिससे उपभोक्ता खर्च में कमी आ सकती है, जो अमेरिकी GDP का एक बड़ा हिस्सा है। किराए के डेटा की गड़बड़ी भले ही अस्थायी हो, लेकिन यह दिखाती है कि डेटा कलेक्शन की समस्याएं कैसे CPI के आंकड़ों को प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि, कोर गुड्स की कीमतों में थोड़ी नरमी आई है, लेकिन सेवाओं और जरूरी खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतें अभी भी चिंताजनक हैं। महंगाई के 2% के लक्ष्य से दूर जाने को देखते हुए, फेड का कीमतों को कंट्रोल करने का संकल्प यह सुनिश्चित करेगा कि ब्याज दरें उम्मीद से ज्यादा समय तक ऊंची बनी रहें, जिससे व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना महंगा होगा।
