यह एक औपचारिक अनुरोध है जो Reliance Group के चेयरमैन अनिल अंबानी ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को भेजा है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रुप के विशाल कर्ज़ को एक व्यवस्थित तरीके से सुलझाना है, खास तौर पर तब जब कंपनी गंभीर वित्तीय और ऑपरेशनल चुनौतियों का सामना कर रही है।
अंबानी का प्रस्ताव है कि यह Lenders Committee भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) के नेतृत्व में बने। इस कमेटी का काम ग्रुप पर बकाया सभी कर्ज़ों का आकलन करना और उसके भुगतान के लिए एक पुनर्गठित योजना (restructured plan) तैयार करना होगा।
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब ग्रुप की वित्तीय स्थिति काफी ख़राब हो चुकी है। एजेंसी जांचों (agency investigations) के कारण ऑपरेशनल बाधाएं (operational constraints) और लिक्विडिटी लॉक-अप (liquidity lock-up) जैसी समस्याएं खड़ी हो गई हैं। इन जांचों के तहत ₹15,000 करोड़ से अधिक की संपत्ति अटैच (asset attach) की गई है, और ग्रुप की मार्केट कैपिटलाइजेशन (market capitalization) ₹25,000 करोड़ से भी अधिक घट चुकी है।
एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग (money laundering) और फ्रॉड (fraud) के कई मामलों में ₹10,000 करोड़ के करीब की संपत्ति ज़ब्त की है। इसके अलावा, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने रिलायंस होम फाइनेंस (Reliance Home Finance) में धोखाधड़ी योजनाओं में भूमिका के लिए अनिल अंबानी पर ₹25 करोड़ का भारी जुर्माना लगाया है और उन्हें बाज़ार में हिस्सेदारी से बैन (market ban) भी किया है।
अनिल अंबानी ने इस पूरे मामले को एक कमर्शियल मामला (commercial matter) बताते हुए कहा है कि वे किसी भी कठोर कार्रवाई (enforcement actions) के बजाय एक संरचित समाधान (structured resolution) पसंद करेंगे।
हालांकि, Reliance Group के पुराने कर्ज़ डिफॉल्ट (debt defaults) और वित्तीय संकट के इतिहास को देखते हुए, इस प्रस्तावित Lenders Committee की प्रभावशीलता पर कुछ संशय बना हुआ है। अतीत में रीस्ट्रक्चरिंग (restructuring) के प्रयासों में अक्सर एसेट्स को सस्ते दामों पर बेचना पड़ा या ऐसे इक्विटी इंजेक्शन (equity injections) पर निर्भर रहना पड़ा जिन्होंने मूल समस्याओं को हल नहीं किया।
ED और SEBI जैसी रेगुलेटरी बॉडीज़ (regulatory bodies) द्वारा की गई बड़ी कार्रवाईयां, जिनमें संपत्ति ज़ब्ती और बाज़ार पर बैन शामिल हैं, ग्रुप के गवर्नेंस (governance) और फाइनेंशियल मैनेजमेंट (financial management) को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
