साल 2025 में भारत में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) में 44% का ज़बरदस्त उछाल आया है, जो बढ़कर $39 अरब हो गया है। इस बढ़ोतरी के पीछे अमेरिका की दिग्गज कंपनी Alphabet का आंध्र प्रदेश में किया गया $14.5 अरब का कमिटमेंट सबसे बड़ा कारण है। हालांकि, कुल मिलाकर विदेशी निवेश बढ़ा है, लेकिन नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं का कुल मूल्य घटकर $74 अरब रह गया है। यह बदलाव दिखाता है कि अब खास इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में ज़्यादा पैसा लग रहा है, बजाय इसके कि कई छोटे-बड़े प्रोजेक्ट्स में पैसा बाँटा जाए।
भारत में FDI में रिकॉर्डतोड़ बढ़ोतरी
साल 2025 में भारत ने फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के मामले में शानदार प्रदर्शन किया है। देश में कुल $39 अरब का विदेशी निवेश आया, जो पिछले साल के मुकाबले 44% ज़्यादा है। इस बड़ी उछाल की मुख्य वजह टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ी कंपनियों का केंद्रित निवेश रहा।
Alphabet का बड़ा दांव
इसमें अमेरिका की टेक्नोलॉजी दिग्गज Alphabet ने अकेले $14.5 अरब का निवेश किया, जो आंध्र प्रदेश में प्रोजेक्ट्स के लिए है। यह एक अकेला निवेश देश के कुल FDI का एक-तिहाई से भी ज़्यादा था!
AI इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्लोबल रैंकिंग पर असर
इस भारी-भरकम निवेश के चलते भारत FDI पाने वाले देशों की ग्लोबल रैंकिंग में 11वें स्थान पर पहुँच गया है। खास तौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड सर्विसेज के लिए फंडिंग जुटाने में भारत की काबिलियत ने बड़ी कंपनियों को आकर्षित किया है। डेटा बताता है कि इस दौरान भारत ने ग्लोबल AI इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश का 8% हिस्सा अपने नाम किया। स्किल्ड वर्कर्स की बड़ी तादाद और डिजिटल सर्विसेज की बढ़ती मांग की वजह से दुनिया भर की बड़ी टेक कंपनियाँ भारत का रुख कर रही हैं।
अन्य बड़े निवेश
टेक सेक्टर के अलावा, पोलैंड की कंपनी Hynfra ने भी आंध्र प्रदेश में रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए $4.1 अरब का निवेश किया है।
नए प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं में नरमी
हालांकि, आने वाले FDI का कुल आंकड़ा बढ़ा है, लेकिन नए प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं के माहौल में थोड़ी नरमी दिखी है। नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स (यानी एकदम नए सिरे से शुरू होने वाले बिज़नेस या इंफ्रास्ट्रक्चर) की घोषणाओं का कुल मूल्य 2024 के $111 अरब से घटकर 2025 में $74 अरब रह गया है। इसका मतलब है कि बड़ी और मौजूदा डील्स में तो खूब पैसा आ रहा है, लेकिन नए और बड़े पैमाने के इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स की शुरुआत धीमी पड़ गई है।
विदेशी निवेश और सरकारी नीतियाँ
दूसरी तरफ, भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में किए जाने वाले निवेश (Outward FDI) में भी 50% की बढ़ोतरी हुई और यह $36 अरब तक पहुँच गया। पिछले पाँच सालों में इस आउटवर्ड इन्वेस्टमेंट की ग्रोथ रेट 26.3% सालाना रही है। यह तब हो रहा है जब इनवर्ड FDI में उतार-चढ़ाव देखा गया है (2020 में $64.1 अरब से गिरकर 2025 में $38.9 अरब हुआ था, जिसके बाद यह रिकवरी आई है)।
इस गति को बनाए रखने के लिए सरकार कई तरह के इंसेंटिव दे रही है, जैसे कैपिटल स्पेंडिंग के लिए सीधा सपोर्ट और सेल्स-लिंक्ड सब्सिडी। इनका खास मकसद इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और क्रिटिकल मिनरल्स की रीसाइक्लिंग जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देना है। अब देखना यह होगा कि सरकारी नीतियाँ भविष्य में FDI को कैसे प्रभावित करती हैं और क्या टेक्नोलॉजी व रिन्यूएबल एनर्जी में हो रहा यह केंद्रित निवेश लंबे समय तक दूसरे इंडस्ट्रियल सेक्टर्स में भी ग्रोथ बनाए रख पाता है।
