AI का नौकरियों पर 'सुनामी' खतरा: भारत में **40%** जॉब्स पर संकट, बढ़ सकती है असमानता!

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
AI का नौकरियों पर 'सुनामी' खतरा: भारत में **40%** जॉब्स पर संकट, बढ़ सकती है असमानता!
Overview

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने आगाह किया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) दुनिया भर में लगभग **40%** नौकरियों को प्रभावित कर सकता है, और भारत जैसे उभरते देशों को बड़े पैमाने पर रोज़गार विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है। भारत भले ही 'AI for All' रणनीति और इंडियाAI मिशन से AI लीडरशिप का लक्ष्य रख रहा हो, लेकिन उसे अपनी युवा आबादी को री-स्किल करने की भारी लागत, डिजिटल डिवाइड और बढ़ती असमानता जैसी बड़ी चुनौतियों से निपटना होगा।

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IMF की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से दुनिया भर में लगभग 40% नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने इसे 'सुनामी' बताया है, जो न सिर्फ आम नौकरियों बल्कि हाई-स्किल्ड, 'व्हाइट-कॉलर' जॉब्स को भी प्रभावित कर सकती है। यह पिछली तकनीकी क्रांतियों से अलग है, क्योंकि AI व्हाइट-कॉलर नौकरियों को सीधे तौर पर प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

भारत 'AI for All' जैसी राष्ट्रीय रणनीति और इंडियाAI मिशन के ज़रिए AI के क्षेत्र में वैश्विक लीडर बनना चाहता है। लेकिन, देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपनी विशाल युवा आबादी को AI के नए दौर के लिए री-स्किल (re-skill) और अप-स्किल (up-skill) करने का भारी-भरकम खर्च। कई अध्ययनों से पता चलता है कि भारत जैसे उभरते देशों में लगभग 40% श्रमबल का विस्थापन हो सकता है, जिसे देश की असमान डिजिटल साक्षरता और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और भी जटिल बना देती है।

AI के विकास से आर्थिक असमानता बढ़ने का खतरा है। जहां यह कुछ हद तक वेतन असमानता (wage inequality) को कम कर सकता है, वहीं यह धन असमानता (wealth inequality) को काफी बढ़ा सकता है, क्योंकि प्रोडक्टिविटी गेन का फायदा मुख्य रूप से पूंजीधारकों को मिलेगा। शहरी और ग्रामीण भारत के बीच लगातार बने रहने वाले डिजिटल डिवाइड (digital divide) के कारण आबादी का एक बड़ा वर्ग पीछे छूट सकता है, जिससे एक 'टू-टियर' AI अर्थव्यवस्था बन सकती है। इन सबके बीच, व्यापक सामाजिक सुरक्षा जाल (social security nets) बनाने के लिए सरकारी खजाने पर भारी दबाव आएगा, खासकर मौजूदा फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficit) और कर्ज के स्तर को देखते हुए।

तेजी से बदलते AI रेगुलेशन (regulation) को लेकर सरकारों के सामने 'पेसिंग प्रॉब्लम' (pacing problem) है, जो ज़रूरी एडॉप्टिव पॉलिसी (adaptive policy) को लागू करने में देरी कर सकती है। री-ट्रेनिंग प्रोग्राम्स और सामाजिक लाभों को बड़े पैमाने पर लागू करने की प्रशासनिक क्षमता (administrative capacity) भी एक बड़ी चुनौती है। भारत के पास अपनी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और युवा आबादी जैसे फायदे हैं, लेकिन इन्हें डिजिटल गैप को पाटने, शिक्षा और स्किलिंग तक समान पहुंच सुनिश्चित करने और एक समावेशी AI इकोसिस्टम (inclusive AI ecosystem) बनाने के प्रयासों के साथ जोड़ना होगा। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (public-private partnerships) नवाचार (innovation) को बढ़ावा देने और AI के फायदों को व्यापक रूप से बांटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ऐतिहासिक रूप से, तकनीकी बदलावों ने अंततः अधिक नौकरियां पैदा की हैं, लेकिन इस संक्रमण काल में सरकार के सक्रिय हस्तक्षेप और निवेश की आवश्यकता है ताकि AI सतत और न्यायसंगत विकास का जरिया बने, न कि सामाजिक दरारों को गहरा करने का।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.