AIDEF (All India Defence Employees Federation) ने 8वें वेतन आयोग के सामने अपनी मांगों का एक बड़ा पिटारा खोला है। इसमें सबसे अहम है लेवल-1 के कर्मचारियों के लिए न्यूनतम बेसिक पे (minimum basic pay) को वर्तमान ₹18,000 से बढ़ाकर ₹69,000 करना। इसके अलावा, सभी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों (central government staff) के लिए फिटमेंट फैक्टर (fitment factor) को 3.833 करने की मांग की गई है, जो 7वें वेतन आयोग के 2.57 से काफी ज़्यादा है। इन कर्मचारियों ने खतरनाक कामों के लिए ₹15,000 मासिक और लगातार जोखिम वाले असाइनमेंट के लिए ₹10,000 का रिस्क और हार्डशिप अलाउंस (risk and hardship allowance) भी मांगा है।
अगर इन मांगों को मान लिया जाए, तो सरकार पर ₹7 से ₹8 लाख करोड़ का भारी वित्तीय बोझ (fiscal burden) पड़ सकता है। यह राशि सीधे अर्थव्यवस्था में जा सकती है, लेकिन सरकार के राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) के लक्ष्यों को बड़ा झटका लग सकता है।
पिछला अनुभव भी सरकार के लिए सबक है। 2016 में लागू किए गए 7वें वेतन आयोग के कारण केंद्र सरकार पर सालाना ₹4.5 लाख करोड़ से ज़्यादा का खर्च बढ़ा था, जिससे राजकोषीय घाटा GDP का करीब 0.7% बढ़ गया था। ऐसी बड़ी वेतन वृद्धि से न केवल सरकारी खर्च बढ़ता है, बल्कि महंगाई (inflation) बढ़ने और आर्थिक विकास दर (economic growth) के धीमे होने का खतरा भी बना रहता है।
सरकार का लक्ष्य अगले कुछ सालों में राजकोषीय घाटे को GDP के 4.4% और 4.3% पर बनाए रखना है। लेकिन इन मांगों को पूरा करने के लिए सरकार को अतिरिक्त उधार (borrowing) लेना पड़ सकता है, जो ब्याज दरों (interest rates) को बढ़ा सकता है और निजी निवेश (private investment) को हतोत्साहित कर सकता है।
8वां वेतन आयोग इस मसले पर विभिन्न कर्मचारी समूहों से विचार-विमर्श कर रहा है। रक्षा और रेलवे कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के साथ 13-14 मई, 2026 को दिल्ली में अहम बैठकें होनी हैं। आयोग को 31 मई, 2026 तक अपनी अंतिम सिफारिशें (recommendations) सौंपनी हैं। ऐसे में, सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह कैसे कर्मचारियों की अपेक्षाओं को पूरा करे और साथ ही देश की आर्थिक स्थिरता (economic stability) और वित्तीय अनुशासन (fiscal discipline) भी बनाए रखे।
