एक नई सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 60% कर्जदार गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। उनकी EMI, उनकी पूरी मासिक पारिवारिक आय के बराबर या उससे ज़्यादा है। कई लोग पुराने कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज ले रहे हैं, जिसका मुख्य कारण लग्जरी खर्च नहीं, बल्कि मेडिकल इमरजेंसी और नौकरी छूटना है।
Detailed Coverage
भारतीय घरों पर बढ़ता EMI का दबाव
भारत में बड़ी संख्या में परिवार गंभीर वित्तीय दबाव झेल रहे हैं। ताजा सर्वे के मुताबिक, देश के 60% कर्जदार अपनी आय के मुकाबले कर्ज चुकाने में भारी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। इसका मतलब है कि उनकी EMI, उनकी कुल पारिवारिक आय के बराबर या उससे भी ज्यादा हो चुकी है। यह स्थिति घरों में वित्तीय अस्थिरता का संकेत है, और कई बार लोगों को मौजूदा कर्ज को चुकाने के लिए लगातार नया कर्ज लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
कर्ज का कारण - मजबूरी या ज़रूरत?
सर्वे से पता चलता है कि कर्ज लेने के पीछे मुख्य कारण लग्जरी या गैर-ज़रूरी खर्चे नहीं, बल्कि ज़रूरी ज़रूरतें हैं। नए कर्ज का 26% हिस्सा मेडिकल इमरजेंसी के लिए लिया जा रहा है, जबकि 22% कर्ज व्यक्तिगत और पारिवारिक ज़रूरतों जैसे शादी-ब्याह और शिक्षा के लिए इस्तेमाल हो रहा है। नौकरी जाने या बिजनेस से आय कम होने जैसे आर्थिक झटकों के कारण 18% लोग कर्ज ले रहे हैं, वहीं 15% लोग तो अपना रोज़मर्रा का घरेलू खर्च चलाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि कर्ज में बढ़ोतरी मुख्य रूप से अप्रत्याशित वित्तीय मुश्किलों का सामना करने का नतीजा है, न कि लाइफस्टाइल पर अत्यधिक खर्च का।
डिफॉल्ट का बढ़ता जोखिम और रिकवरी की मुश्किलें
वित्तीय तनाव अब पेमेंट में चूक के रूप में सामने आ रहा है। कर्ज चुकाने में संघर्ष कर रहे लोगों में से लगभग 33% ने नौकरी छूटने या सैलरी कटने को मुख्य कारण बताया है, जबकि 28% लोगों ने अपनी आय के मुकाबले बहुत ज़्यादा EMI को ज़िम्मेदार ठहराया है। स्थिति की गंभीरता इस बात से झलकती है कि जब कर्जदार प्रोफेशनल डेट काउंसलिंग के पास पहुंचते हैं, तो 60% लोग या तो पेमेंट पूरी तरह बंद कर चुके होते हैं या सिर्फ न्यूनतम राशि ही दे पाते हैं।
रिपोर्ट में कर्ज वसूली के तरीकों को लेकर भी गंभीर चुनौतियां सामने आई हैं। लगभग एक-तिहाई कर्जदारों ने किसी न किसी प्रकार की उत्पीड़न (harassment) का अनुभव किया है, जिसमें 17% ने सीधे धमकी या रिकवरी एजेंटों द्वारा बार-बार घर आने जैसी गंभीर दिक्कतों का सामना किया है। इसके अलावा, 20% लोगों को पहले ही कानूनी नोटिस मिल चुका है, जो कर्ज चुकाने में असमर्थ लोगों के लिए कानूनी जोखिमों को उजागर करता है।
वित्तीय क्षेत्र के लिए क्या हैं मायने?
घरों में बढ़ता कर्ज-से-आय अनुपात (debt-to-income ratio) भारतीय वित्तीय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। उच्च स्तर का घरेलू कर्ज बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लिए नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) को बढ़ा सकता है। जैसे-जैसे ज़्यादा लोग बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज पर निर्भर होंगे, कंज्यूमर क्रेडिट मार्केट की आगे बढ़ने की क्षमता पर दबाव आ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कर्जदाताओं और नीति निर्माताओं को डिफ़ॉल्ट को संभालने के लिए ज़्यादा मज़बूत और संरचित कर्ज समाधान (debt resolution) के ढांचे पर विचार करने की ज़रूरत है, साथ ही वसूली के मानकों को भी निष्पक्ष बनाए रखना होगा। निवेशकों के लिए, यह रुझान रिटेल क्रेडिट सेगमेंट में नरमी का संकेत देता है।
