अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के होम वर्क कन्वेंशन को 30 साल बीत चुके हैं, लेकिन भारत में लाखों होम-बेस्ड वर्कर्स अब भी औपचारिक सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर हैं। अर्थव्यवस्था और निवेशकों के लिए, यह मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन में औपचारिकता की धीमी गति को उजागर करता है। 2020 के सोशल सिक्योरिटी कोड में एक रोडमैप तो है, लेकिन टेक्सटाइल और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में इसे लागू करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जहाँ संचालन के लिए असंगठित मज़दूर महत्वपूर्ण हैं।
क्या हुआ?
20 जून, 2026, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के कन्वेंशन 177 की 30वीं वर्षगांठ है, जिसका उद्देश्य होम-बेस्ड वर्कर्स (HBWs) को औपचारिक श्रम अधिकारों के दायरे में लाना था। तीन दशक बीत जाने के बाद भी, भारत ने इस कन्वेंशन की पुष्टि नहीं की है। लाखों होम-बेस्ड वर्कर्स, खासकर कपड़ा फिनिशिंग और हस्तशिल्प उत्पादन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं, बिना आधिकारिक रोज़गार अनुबंध, बुनियादी सामाजिक सुरक्षा या निश्चित मज़दूरी के काम कर रही हैं। मुख्य समस्या यह है कि ये वर्कर अक्सर आधिकारिक आर्थिक डेटा में अदृश्य रहते हैं, और उन्हें औपचारिक औद्योगिक सप्लाई चेन का हिस्सा मानने के बजाय घरेलू काम का विस्तार माना जाता है।
आर्थिक और निवेशक परिप्रेक्ष्य
निवेशकों और बाज़ार विश्लेषकों के लिए, असंगठित वर्कफ़ोर्स की स्थिति केवल एक सामाजिक चिंता नहीं है; यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है। भारत के मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट का एक बड़ा हिस्सा—विशेष रूप से टेक्सटाइल, चमड़े के सामान और हस्तशिल्प जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों में—इन विकेन्द्रीकृत उत्पादन नेटवर्क पर निर्भर करता है। जब मज़दूर असंगठित और अदृश्य रहते हैं, तो यह एक स्थायी 'डेटा गैप' पैदा करता है। इससे नीति निर्माताओं के लिए वास्तविक आर्थिक स्वास्थ्य का आकलन करना और कंपनियों के लिए सप्लाई चेन की स्थिरता सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है।
व्यावसायिक दृष्टिकोण से, अनौपचारिक मज़दूरी अक्सर सस्ती होती है, लेकिन इसमें छिपे हुए जोखिम भी होते हैं। जैसे-जैसे वैश्विक निवेशक पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) मानकों को अधिक महत्व दे रहे हैं, अपारदर्शी सप्लाई चेन वाली कंपनियों—जहाँ श्रम अधिकार और सामाजिक सुरक्षा अनुपालन को सत्यापित करना मुश्किल है—बढ़ती जांच का सामना कर रही हैं। सूचीबद्ध कंपनियों के लिए, भविष्य में इन वर्कर्स को औपचारिक नियामक छत्र के तहत लाने वाले किसी भी आदेश से परिचालन लागत में संरचनात्मक वृद्धि हो सकती है।
औपचारिकता में चुनौतियां
नीति और व्यवहार के बीच का अंतर मुख्य बाधा बना हुआ है। हालाँकि सरकार ने 2020 में सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security) पेश की थी, जिसे असंगठित और होम-बेस्ड वर्कर्स को सुरक्षा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, इसका पूर्ण कार्यान्वयन अभी भी प्रगति पर है। सरकार ने असंगठित वर्कर्स को पंजीकृत करने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस, जैसे ई-श्रम पोर्टल, बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है। हालाँकि, पंजीकरण से लेकर स्वास्थ्य बीमा और पेंशन जैसे वास्तविक लाभों की डिलीवरी तक का सफर एक जटिल परिचालन कार्य है जो अभी जारी है।
सप्लाई चेन जोखिम और अवसर
कई मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र होम-बेस्ड मज़दूरी द्वारा प्रदान की जाने वाली लचीलेपन पर निर्भर करते हैं। हालाँकि, यह लचीलापन सप्लाई चेन ऑडिट के दौरान जोखिम में बदल सकता है। जो कंपनियां अपने डाउनस्ट्रीम, अनौपचारिक वर्कर्स की भलाई का हिसाब रखने में विफल रहती हैं, उन्हें मज़दूर कानूनों के सख्त होने पर प्रतिष्ठा संबंधी क्षति या नियामक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके विपरीत, जो कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को औपचारिक बनाने या बेहतर काम करने की स्थिति प्रदान करने में सक्रिय रूप से निवेश करती हैं, वे अंतरराष्ट्रीय अनुपालन मानकों को पूरा करने में बेहतर स्थिति में हो सकती हैं, जिससे निर्यात बाजारों में एक बढ़त मिल सकती है जहाँ उच्च ESG अनुपालन की मांग होती है।
आगे क्या देखें
निवेशकों को सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के कार्यान्वयन की प्रगति पर नज़र रखनी चाहिए। प्रमुख संकेतकों में असंगठित वर्कर्स के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस पर अपडेट और कोई भी सरकारी निर्देश शामिल हैं जो यह बदल सकते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को मज़दूर लागत की रिपोर्ट कैसे करनी होगी। इसके अतिरिक्त, टेक्सटाइल और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों की कंपनियों से सप्लाई चेन ऑडिट और मज़दूर सोर्सिंग प्रथाओं के संबंध में प्रबंधन की टिप्पणी, यह स्पष्ट करेगी कि फर्में अनौपचारिक मज़दूर क्षेत्र में संभावित नियामक बदलावों के लिए कैसे तैयारी कर रही हैं।
