Skyline Millars के फाइनेंशियल ईयर 2026 के नतीजे बताते हैं कि कंपनी के सामने अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं। इस तिमाही में ₹0.46 करोड़ का नेट लॉस हुआ, जबकि कुल आय मात्र ₹7.09 लाख रही। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऑपरेशनल रेवेन्यू का शून्य होना, कंपनी के बिजनेस के लिए एक गंभीर संकेत है।
इसकी मुख्य वजह रियल एस्टेट सेक्टर में चल रही दिक्कतें हैं, खासकर मुंबई के घाटकोपर में कंपनी के एक प्रमुख डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में 2011 से सुप्रीम कोर्ट से जुड़े मामले के कारण लगातार देरी हो रही है। इसी वजह से प्रोजेक्ट का अगला फेज शुरू नहीं हो पा रहा है।
Skyline Millars का इतिहास 100 साल से भी अधिक पुराना है। पहले यह Millars India Limited के नाम से जानी जाती थी और एक बीमार कंपनी (sick company) के तौर पर पुनर्जीवित होने का लंबा सफर तय कर चुकी है।
कंपनी के लिए सबसे बड़ा जोखिम घाटकोपर प्रोजेक्ट में चल रहा कानूनी मामला ही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सीधा असर कंपनी की कमाई और मुनाफे पर पड़ सकता है। ऐसे में, निवेशक इसी कानूनी पेंच पर आगे की अपडेट्स का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
इसके अलावा, सरकार द्वारा लेबर लॉ (श्रम कानूनों) को चार व्यापक कोड में समेकित करने का फैसला 21 नवंबर, 2025 से लागू होने वाला है। इससे कंपनी के खर्चों में कुछ बढ़ोतरी की संभावना है, हालांकि इसका तात्कालिक असर फिलहाल बहुत बड़ा नहीं माना जा रहा है।
कंपनी के भविष्य के प्रदर्शन के लिए इन परिचालन बाधाओं को दूर करना और लगातार रेवेन्यू उत्पन्न करना सबसे महत्वपूर्ण होगा, हालांकि नतीजों के फाइलिंग में इस संबंध में कोई विशेष समय-सीमा नहीं बताई गई है।
