ज़मीन विवाद का सच
EEBPL ने KIADB के उस आदेश को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी है जिसमें करीब 78 एकड़ ज़मीन वापस मांगी गई है। KIADB का आरोप है कि EEBPL ने लीज़-कम-सेल एग्रीमेंट (LCSA) की शर्तों का उल्लंघन किया है। बोर्ड के मुताबिक, कंपनी ने अनधिकृत सब-लीज (sub-lease) की व्यवस्थाएं कीं और KIADB की मंजूरी के बिना ज़मीन के कुछ हिस्सों को बेचने के समझौते किए।
EEBPL इन आरोपों से इनकार कर रहा है। कंपनी का कहना है कि उन्होंने KIADB से ज़रूरी नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOCs) लेने के बाद ही कोई सब-लीज व्यवस्था की थी। साथ ही, ज़मीन बेचने के समझौते केवल शर्तों पर आधारित थे, न कि मालिकाना हक के ट्रांसफर के। यह ज़मीन जून 2007 में हुए LCSA के तहत है, जो जून 2029 तक वैध है। KIADB इस कार्रवाई के लिए कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरियाज डेवलपमेंट एक्ट, 1966 की धारा 34B का इस्तेमाल कर रहा है।
कोर्ट से मिली फौरी राहत
26 मार्च, 2026 को हुई सुनवाई के दौरान, KIADB ने हाई कोर्ट को भरोसा दिलाया कि अगली सुनवाई यानी 8 अप्रैल, 2026 तक ज़मीन वापस लेने के आदेश पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस फैसले से EEBPL को फिलहाल कानूनी लड़ाई जारी रखने के लिए वक्त मिल गया है।
पृष्ठभूमि और जुड़े जोखिम
यह मामला KIADB से जुड़े ज़मीनी विवादों की लंबी लिस्ट का हिस्सा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले 4-5 सालों में KIADB के खिलाफ करीब 1,748 मामले दर्ज हुए हैं, जो ज़मीन आवंटन में अनियमितताओं की ओर इशारा करते हैं।
Embassy Developments के लिए इस मामले का नतीजा बहुत अहम है। अगर कोर्ट का फैसला KIADB के पक्ष में जाता है, तो कंपनी को 78 एकड़ ज़मीन का नुकसान हो सकता है, जिसका असर उनके डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स पर पड़ सकता है। ऐसे कानूनी मामले कंपनियों के समय और पैसे दोनों खर्च करवाते हैं। Embassy Developments रियल एस्टेट सेक्टर में DLF Ltd., Prestige Estates Projects Ltd., और Lodha Developers Ltd. जैसे बड़े खिलाड़ियों के साथ मुकाबला करती है, और ये सभी कंपनियां ऐसे रेगुलेटरी माहौल से गुजरती हैं।
अब सबकी निगाहें 8 अप्रैल, 2026 की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ इस मामले में आगे क्या होता है, यह देखा जाएगा।
