FY26 के लिए ₹1,188.74 करोड़ का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट दर्ज किया गया है, जो पिछले साल के ₹18.38 करोड़ की तुलना में काफी ज्यादा है। यह बड़ा उछाल मुख्य रूप से कर्ज़ के समाधान (debt settlement) से मिले मुनाफे के कारण आया है। कंपनी ने JCF ARC को ₹70 करोड़ का वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) भुगतान किया, जिसके चलते ₹450.73 करोड़ का विवादित ब्याज (disputed interest) और ₹675.22 करोड़ का विवादित मूलधन (disputed principal) रिवर्ट हो गया। स्टैंडअलोन आधार पर भी नेट प्रॉफिट ₹1,059.31 करोड़ रहा, जो पिछले साल के ₹5.30 करोड़ से बहुत आगे है।
इस सौदे के बाद, 31 मार्च, 2026 तक कंपनी का कंसोलिडेटेड कर्ज़ शून्य हो गया, जो पहले ₹133.85 करोड़ था। अच्छी खबर यह भी है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने कंपनी के खिलाफ कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) की अर्ज़ी को खारिज कर दिया है, जिससे दिवालियापन का खतरा टल गया है।
ऑपरेशनल मोर्चे पर भी कंपनी ने अच्छी ग्रोथ दिखाई है। कंसोलिडेटेड रेवेन्यू में 110.94% की शानदार बढ़त देखी गई। स्टैंडअलोन टोटल इनकम FY26 में ₹35.03 करोड़ रही, जो पिछले साल से 560.94% ज्यादा है। वहीं, कंसोलिडेटेड टोटल इनकम ₹32.21 करोड़ दर्ज की गई, जो 110.94% की ईयर-ऑन-ईयर ग्रोथ है।
यह बड़ा फाइनेंशियल टर्नअराउंड Satchmo Holdings के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। कर्ज़ की लंबी समस्याएं सुलझने और इंसॉल्वेंसी का खतरा टलने से कंपनी अब एक इन्वेस्टमेंट और होल्डिंग कंपनी के तौर पर अपनी रणनीति पर फोकस कर सकती है।
हालाँकि, कुछ छोटी-मोटी देनदारियाँ और विवाद अभी बाकी हैं। ऑडिटर्स ने कुछ ट्रेड पेएबल्स (₹3.64 करोड़) और वेंडर एडवांसेज़ (₹14.26 करोड़) के लिए कन्फर्मेशन की कमी बताई है। इसके अलावा, लॉन्ग आइलैंड प्रोजेक्ट के लिए ₹19.28 करोड़ की विवादित देनदारी, पुराने वैट बकाया ₹12.59 करोड़ और HDFC Ltd से ₹15.54 करोड़ के सेटलमेंट के लिए 'नो ड्यूज़' सर्टिफिकेट का इंतज़ार है। 'रियो' प्रोजेक्ट का RERA रजिस्ट्रेशन भी मार्च 2019 से रिन्यू नहीं हुआ है।
निवेशकों की नज़रें अब बाकी बची देनदारियों को सुलझाने, इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर कंपनी की रणनीति के अमल और कोर ऑपरेशनल रेवेन्यू में ग्रोथ पर रहेंगी।
