NCLT का फैसला और CIRP की शुरुआत
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) चंडीगढ़ बेंच ने 19 फरवरी, 2026 को Telephone Cables Limited को कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में आधिकारिक तौर पर एडमिट कर लिया है। यह इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 के तहत एक बड़ा कदम है, जिसके बाद कंपनी अब एक तय प्रक्रिया के तहत काम करेगी।
₹5,920 करोड़ से ज़्यादा के भारी-भरकम क्लेम
कंपनी के खिलाफ अब तक कुल ₹5,920.87 करोड़ के वेरिफाइड फाइनेंशियल क्लेम (Verified Financial Claims) फाइल किए जा चुके हैं। इन सभी दावों की देखरेख अब क्रेडिटर्स की कमेटी (Committee of Creditors - CoC) करेगी, जो कंपनी के भविष्य के फैसलों में अहम भूमिका निभाएगी।
क्रेडिटर्स की कमेटी का गठन और प्रमुख दावेदार
13 मार्च, 2026 को क्रेडिटर्स की कमेटी (CoC) का विधिवत गठन किया गया। इस कमेटी में वो फाइनेंशियल क्रेडिटर शामिल हैं जिनके दावों का कुल मूल्य ₹5,920.87 करोड़ है। प्रमुख क्रेडिटर्स और उनके दावों का विवरण इस प्रकार है:
- Omkara Assets Reconstruction Pvt Ltd: ₹51,997.89 करोड़ ( 87.82% वोटिंग शेयर के साथ)
- Kotak Mahindra Bank Ltd: ₹3,684.81 करोड़ ( 6.22% वोटिंग शेयर के साथ)
- Punjab & Sind Bank: ₹2,155.00 करोड़ ( 3.64% वोटिंग शेयर के साथ)
- Canara Bank: ₹1,371.00 करोड़ ( 2.32% वोटिंग शेयर के साथ)
शेयरहोल्डर्स के हाथ से फिसला कंट्रोल
इस डेवलपमेंट का सीधा मतलब है कि Telephone Cables Limited का कंट्रोल अब कंपनी के पुराने मैनेजमेंट और शेयरहोल्डर्स के हाथ से निकल गया है। कंपनी के दैनंदिन कामकाज और एसेट्स को मैनेज करने की जिम्मेदारी Ducturus Resolution Professionals Pvt. Ltd. के एक इंटरिम रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (IRP) को सौंपी गई है।
शेयरहोल्डर्स के लिए खतरे की घंटी
इन्सॉल्वेंसी प्रोसेस का मुख्य उद्देश्य कंपनी के कर्जों को सुलझाना होता है। ऐसे में, शेयरहोल्डर्स की वैल्यू पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यदि कोई समाधान योजना (Resolution Plan) सफल नहीं होती है, तो कंपनी की संपत्तियों को लिक्विडेट (Liquidation) करने का कदम भी उठाया जा सकता है, जिससे शेयरहोल्डर्स को बड़ा नुकसान हो सकता है।
लंबा कानूनी और फाइनेंशियल संघर्ष
1983 में इनकॉर्पोरेट हुई Telephone Cables Limited का कानूनी सफर काफी लंबा और जटिल रहा है। 2003 में एक वाइंडिंग-अप याचिका (winding-up petition) दायर की गई थी, और जुलाई 2015 में पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने इसे बंद करने का आदेश दिया था। कंपनी लंबे समय से फाइनेंशियल स्ट्रेस झेल रही थी, जिससे लोन रिकॉल हुए और क्रेडिटर्स के प्रति उसकी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं हो सकीं।
आगे क्या होगा?
अब फोकस एक व्यवहार्य समाधान योजना (Resolution Plan) तैयार करने पर होगा। इसमें वित्तीय पुनर्गठन (financial restructuring), कंपनी के किसी हिस्से या पूरे बिजनेस की बिक्री, या मैनेजमेंट में बड़े बदलाव जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं। यदि तय समय सीमा में कोई भी समाधान योजना मंजूर नहीं हुई, तो कंपनी को लिक्विडेशन का सामना करना पड़ सकता है।
