कंपनी के खिलाफ यह मांग रामगढ़ डिस्ट्रिक्ट माइनिंग ऑफिस ने जारी की है। आरोप है कि Tata Steel ने अपने वेस्ट बोकारो कोलियरी से 2000-01 से 2006-07 के फाइनेंशियल ईयर के दौरान तय सीमा से 1.62 करोड़ मीट्रिक टन ज़्यादा कोयला निकाला है। इसी के आधार पर ₹175.51 करोड़ का भुगतान मांगा गया है।
Tata Steel इस आरोप से सहमत नहीं है। कंपनी का कहना है कि यह मांग बेबुनियाद है। इस संबंध में Tata Steel ने 24 अप्रैल 2026 को कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) के पास एक रिवीजन एप्लीकेशन (Revision Application) दाखिल कर दी है।
यह मामला कंपनी के लिए काफी अहम है, क्योंकि अगर यह मांग मानी गई तो Tata Steel के मुनाफे (Profit) पर बड़ा असर पड़ सकता है। यह घटना भारत में माइनिंग सेक्टर में बढ़ती रेगुलेटरी जांच का एक और उदाहरण है, खासकर पुराने खनन अभ्यासों को लेकर। ऐसी रेट्रोस्पेक्टिव (retrospective) लायबिलिटीज़ (liabilities) कंपनियों के लिए बड़ा जोखिम पैदा करती हैं।
माइनिंग ऑफिस की यह मांग सुप्रीम कोर्ट के 'कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' (Common Cause vs. Union of India) जैसे अहम फैसलों से प्रभावित हो सकती है, जिन्होंने अनधिकृत खनन पर नकेल कसी थी। Tata Steel जैसी बड़ी इंटीग्रेटेड स्टील प्रोड्यूसर के लिए अपनी खदानों का सुचारू संचालन महत्वपूर्ण है।
रिवीजन एप्लीकेशन फाइल करने के साथ ही Tata Steel ने कानूनी लड़ाई का पहला कदम उठा दिया है। कंपनी का लक्ष्य इस एप्लीकेशन के ज़रिए फिलहाल इस भारी भुगतान से बचना है। निवेशक इस मामले पर कोयला मंत्रालय के फैसले और आगे की कानूनी कार्रवाई पर बारीकी से नज़र रखेंगे।
यह स्थिति सिर्फ Tata Steel के लिए ही नहीं, बल्कि JSW Steel और SAIL जैसी अन्य बड़ी स्टील कंपनियों के लिए भी प्रासंगिक है, जो बड़े पैमाने पर माइनिंग ऑपरेशन चलाती हैं और समान रेगुलेटरी माहौल का सामना करती हैं।
