गहराता संकट: कंपनी सेक्रेटरी ने छोड़ी SKIL Infra
यह इस्तीफा SKIL Infra की गहरी वित्तीय मुश्किलों और परिचालन चुनौतियों की ओर साफ इशारा करता है। Nilesh Mehta, जो कंपनी के कंपनी सेक्रेटरी और कंप्लायंस ऑफिसर थे, ने 10 अप्रैल, 2026 से प्रभावी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफे में स्पष्ट रूप से कहा है कि 24 महीने यानी 2 साल से अधिक समय से उन्हें सैलरी का भुगतान नहीं किया गया है, और इंंसॉल्वेंसी की प्रक्रिया के दौरान उनके वेतन (remuneration) में भी कटौती की गई है।
गवर्नेंस और कंप्लायंस पर असर
एक कंपनी सेक्रेटरी का पद कंपनी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, खासकर जब कंपनी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के तहत इंंसॉल्वेंसी प्रक्रिया से गुजर रही हो। ऐसे में, इस महत्वपूर्ण पद का खाली होना SKIL Infra के लिए रेगुलेटरी कंप्लायंस (regulatory compliance) और कॉर्पोरेट गवर्नेंस (corporate governance) को बनाए रखने में बड़ी बाधाएं खड़ी कर सकता है। यह स्थिति कंपनी के संचालन में निरंतरता और संकट समाधान प्रक्रिया की सुचारू प्रगति को भी प्रभावित कर सकती है, खासकर जब अतीत में मैनेजमेंट की ओर से सहयोग न मिलने के मामले सामने आए हों।
SKIL Infra की इंंसॉल्वेंसी की पृष्ठभूमि
SKIL Infrastructure Limited, जो एक इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फर्म है, 1 फरवरी, 2024 को NCLT मुंबई के आदेश के बाद इंंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में दाखिल हुई थी। कानूनी अड़चनों के बाद, नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने 15 अक्टूबर, 2025 को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) के गठन पर लगी रोक हटा दी। इसके बाद 3 नवंबर, 2025 को Purusottam Behera को रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) नियुक्त किया गया। इससे पहले, अगस्त 2024 में, सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने कंपनी के प्रमोटर्स और डायरेक्टर्स पर 2019-20 फाइनेंशियल ईयर के वित्तीय डेटा को गलत तरीके से पेश करने और खुलासे में देरी के लिए ₹55 लाख का जुर्माना लगाया था। उसी फाइनेंशियल ईयर में, कंपनी ने ₹1,411 करोड़ का भारी घाटा दर्ज किया था।
आगे क्या?
SKIL Infra को अब जल्द से जल्द एक नए कंपनी सेक्रेटरी और कंप्लायंस ऑफिसर की नियुक्ति करनी होगी ताकि वह कानूनी और रेगुलेटरी दायित्वों को पूरा कर सके। इस इस्तीफे से यह भी संकेत मिलता है कि कंपनी कर्मचारियों को बनाए रखने में संघर्ष कर रही है, जिससे और भी इस्तीफे हो सकते हैं। कंपनी सेक्रेटरी के बिना, विशेष रूप से कुछ SEBI लिस्टिंग रेगुलेशन से छूट प्राप्त होने के बावजूद, कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मानकों को बनाए रखना और भी मुश्किल होगा। इससे इंंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रक्रिया में और देरी या जटिलताएं आ सकती हैं।
