REEs: भविष्य की तकनीक के लिए जरूरी
Rare Earth Elements (REEs) आजकल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs), सेमीकंडक्टर, रिन्यूएबल एनर्जी और डिफेंस जैसे तेजी से बढ़ते सेक्टर्स के लिए बेहद जरूरी हैं। भारत सरकार भी इन क्रिटिकल मिनरल्स (critical minerals) में आत्मनिर्भरता बढ़ाना चाहती है। इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, केरल सरकार के उपक्रम Kerala Minerals and Metals Ltd. (KMML) ने Midwest Limited को अपने REEs पायलट प्रोजेक्ट के लिए लीड कंसोर्टियम पार्टनर (Lead Consortium Partner) बनाया है।
Midwest का बड़ा दांव
Midwest, जो अब तक मुख्य रूप से ब्लैक गैलेक्सी ग्रेनाइट (Black Galaxy Granite) के सबसे बड़े प्रोड्यूसर और एक्सपोर्टर के तौर पर जानी जाती थी, अब इस स्ट्रेटेजिक सेक्टर में एंट्री कर रही है। कंपनी इस पायलट प्लांट के लिए पूरा कैपिटल इन्वेस्टमेंट करेगी। प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक अप्रूवल मिलने के छह महीनों के भीतर इस प्लांट को चालू करने का लक्ष्य है। यह मूव Midwest के लिए एक बड़ा डायवर्सिफिकेशन (diversification) है, जो इसके पारंपरिक बिजनेस से काफी अलग है।
आगे क्या?
इस प्रोजेक्ट की सफलता के लिए कुछ अहम कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, KMML के साथ एक फॉर्मल एमओयू (MoU) साइन करना होगा। इसके बाद, केंद्र और राज्य सरकारों से सभी जरूरी रेगुलेटरी अप्रूवल (regulatory approvals) हासिल करने होंगे। हालांकि, अप्रूवल मिलने के छह महीनों में प्लांट शुरू करने का लक्ष्य है, लेकिन अप्रूवल प्रक्रिया में देरी की आशंका बनी हुई है।
इंडस्ट्री में क्या चल रहा है?
भारत में REE सेक्टर में अब तक IREL (India) Limited जैसी सरकारी कंपनियां ही आगे रही हैं। लेकिन अब Vedanta और GMDC जैसी प्राइवेट कंपनियां भी इस सेक्टर में कदम रख रही हैं। Midwest का यह कदम इस बढ़ती प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को दर्शाता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को KMML के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर का इंतजार रहेगा। साथ ही, जरूरी रेगुलेटरी और एनवायर्नमेंटल अप्रूवल (environmental approvals) मिलने की प्रगति पर भी नजर रखनी होगी। पायलट प्लांट के निर्माण और कमीशनिंग शेड्यूल के साथ-साथ टेक्नोलॉजी पार्टनर्स (technology partners) की जानकारी भी अहम होगी।
