मुनाफे के साथ ऑडिटर की चिंताएं
Maxgrow India Ltd. ने 31 दिसंबर, 2025 को समाप्त हुई तिमाही और नौ महीनों के लिए अपने अन-ऑडिटेड फाइनेंशियल रिजल्ट्स (Financial Results) जारी कर दिए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड मुनाफा (Consolidated Profit) तीसरी तिमाही में ₹111.48 करोड़ रहा, जबकि पहले नौ महीनों में यह ₹274.71 करोड़ तक पहुंच गया।
हालांकि, यह तस्वीर सिर्फ एक तरफा है। कंपनी के स्टैंडअलोन ऑपरेशंस (Standalone Operations) ने इस तिमाही में ₹0.20 करोड़ और नौ महीनों में ₹0.93 करोड़ का घाटा दिखाया है।
ऑडिटर की 'क्वालिफाइड ओपिनियन' (Qualified Opinion)
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि कंपनी के स्टेट्यूटरी ऑडिटर (Statutory Auditor) ने नतीजों पर 'क्वालिफाइड ओपिनियन' दिया है। रिपोर्ट में गवर्नेंस और कंप्लायंस को लेकर कई गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं:
- कंपनी का अपने कुछ स्टेट्यूटरी रिकॉर्ड्स (Statutory Records) को ठीक से मेंटेन न करना।
- 'कंपनीज एक्ट, 2013' और SEBI के LODR (Listing Obligations and Disclosure Requirements) नियमों का पालन न करना।
- फाइनेंशियल रिजल्ट्स को तय समय-सीमा के बाद फाइल करना।
- जरूरी इंटरनल ऑडिट (Internal Audit) का न होना।
- कुछ बड़े अकाउंटिंग इश्यूज (Accounting Issues), जैसे इंटरेस्ट-फ्री लोन (Interest-free loans) और अनडिस्ट्रीब्यूटेड डिविडेंड (Undistributed Dividends) का गलत हिसाब-किताब।
- एक अहम अनलिस्टेड सब्सिडियरी (Unlisted Subsidiary) के बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर (Independent Director) का न होना।
NCLT के बाद का दौर
Maxgrow India इस समय नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के तहत रीस्ट्रक्चरिंग (Restructuring) के बाद ऑपरेशनल रिवाइवल (Operational Revival) के दौर से गुजर रही है। रिपोर्टिंग पीरियड में कंपनी के कोई खास बिजनेस ऑपरेशन नहीं हुए हैं, क्योंकि कंपनी नए सिरे से शुरुआत करने की तैयारी कर रही है।
सुधार के कदम
कंपनी इन चिंताओं को दूर करने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है। हाल ही में, मिस्टर अक्षय केन (Mr. Akshay Kene) को नए कंपनी सेक्रेटरी (Company Secretary) और कंप्लायंस ऑफिसर (Compliance Officer) के तौर पर नियुक्त किया गया है। साथ ही, M/s. Abhay Kumar Pal & Co. को सीक्रेटरियल ऑडिटर (Secretarial Auditor) नियुक्त किया गया है। कंपनी का लक्ष्य 15 अप्रैल, 2026 तक ऑडिटर की चिंताओं को दूर करना है।
निवेशकों की नजरें अब इस बात पर रहेंगी कि कंपनी इन गंभीर कंप्लायंस गैप्स (Compliance Gaps) को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से ठीक करती है।
