शेयरधारकों ने क्यों ठुकराई डील?
यह प्रस्ताव Linde India और Praxair India के बीच वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए होने वाले सौदों को मंजूरी देने के लिए बुलाया गया था। प्रस्तावित लिमिट ₹417.70 करोड़ थी, जो FY2024-25 के लिए Linde India के कंसोलिडेटेड टर्नओवर का 10% थी।
हालांकि, प्रस्ताव को भारी बहुमत से अस्वीकार कर दिया गया। डाले गए वोटों में से 1,30,99,840 (यानी 89.24%) वोट प्रस्ताव के खिलाफ थे, जबकि केवल 15,79,994 (यानी 10.76%) वोट इसके पक्ष में थे। इस हार का मतलब है कि प्रस्तावित सौदे को इस मंजूरी के तहत आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
गवर्नेंस पर सवाल और सप्लाई चेन का संकट
शेयरधारकों द्वारा इस तरह का कड़ा विरोध कॉरपोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) पर निवेशकों के बढ़ते फोकस और माइनॉरिटी शेयरहोल्डर राइट्स (Minority Shareholder Rights) को दर्शाता है। Linde India, जो पहले से ही रिलेटेड पार्टी डीलिंग्स (Related Party Dealings) को लेकर रेगुलेटरी जांच के दायरे में है, के लिए यह वोट इन विशेष सौदों में विश्वास की कमी का संकेत देता है।
इस फैसले के बाद, Linde India को अब Praxair India से जरूरी इंडस्ट्रियल (Industrial) और मेडिकल गैस (Medical Gas) की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक तरीके खोजने होंगे, क्योंकि प्रस्तावित रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन (Related Party Transaction) का ढांचा अब मौजूद नहीं है। इससे Linde India के ऑपरेशंस (Operations) और उसके ग्राहकों के लिए सप्लाई में रुकावट और लॉजिस्टिकल (Logistical) चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। मैनेजमेंट को अपनी स्ट्रेटेजी (Strategy) पर फिर से विचार करना होगा और सप्लाई की निरंतरता सुनिश्चित करनी होगी। यह स्थिति SEBI के साथ past related party transaction norms को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई के बीच आई है।
मुख्य जोखिमों में सप्लाई की निरंतरता बनाए रखना, वैकल्पिक तरीकों से लागत में संभावित वृद्धि, SEBI के साथ जारी कानूनी मामले, और मैनेजमेंट के लिए ऑपरेशंस व ग्राहकों की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की चुनौती शामिल है।