भारत में पहली बार कोल गैसिफिकेशन से DRI का उत्पादन
Jindal Steel ने अब स्वदेशी कोयले और एडवांस्ड सिन्गैस (Syngas) टेक्नोलॉजी का उपयोग करके डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) का उत्पादन करने वाला भारत का पहला प्लांट शुरू कर दिया है। इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य देश की फ्यूल इंडिपेंडेंस को बढ़ाना और पर्यावरण-अनुकूल (Greener) स्टील उत्पादन को बढ़ावा देना है। कंपनी पहले से ही अपने गैल्वनाइजिंग, कलर कोटिंग और ब्लास्ट फर्नेस में सिन्गैस का उपयोग कर रही है। यह कदम कंपनी की आयातित ईंधनों पर निर्भरता को काफी कम करेगा और प्रति टन स्टील पर कार्बन उत्सर्जन को भी घटाएगा।
यह कदम क्यों है अहम?
इस डेवलपमेंट से भारत इनोवेटिव स्टीलमेकिंग के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो गया है। यह घरेलू संसाधनों का उपयोग करके भारत की ईंधन सुरक्षा चिंताओं को दूर करने में मदद करता है। हरित उद्योग के लिए इस टेक्नोलॉजी का उपयोग, स्टील उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्लांट का बैकग्राउंड
Jindal Steel and Power (JSPL) पहले भी कोल गैसिफिकेशन पर काम करती रही है। जनवरी 2020 में, कंपनी ने अपने अंगुल (Angul) प्लांट में भारत की एकमात्र कोल गैसिफिकेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरू किया था। JSPL की अंगुल और राउरकेला में दो और कोल गैसिफिकेशन DRI प्लांट लगाने की भी योजना थी, जिनमें से प्रत्येक की क्षमता 2 मिलियन मीट्रिक टन थी। कंपनी को अंगुल प्रोजेक्ट के लिए सरकार से ₹569.05 करोड़ की सहायता मिली थी, जिसमें कोयले को DRI में बदलना और कार्बन कैप्चर सिस्टम शामिल था। JSPL की रणनीति का हिस्सा स्टील उत्पादन को DRI-इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस मेथड की ओर बढ़ाना भी था।
मुख्य प्रभाव
- ईंधन आत्मनिर्भरता: भारत स्टीलमेकिंग के लिए कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों के आयात पर कम निर्भर होगा।
- ग्रीन स्टील: यह प्लांट काफी कम कार्बन उत्सर्जन के साथ स्टील उत्पादन को सक्षम बनाता है।
- टेक्नोलॉजी लीडर: Jindal Steel नई, पर्यावरण-अनुकूल स्टीलमेकिंग विधियों को अपनाने में नेतृत्व कर रहा है।
- सिन्गैस का उपयोग: फर्नेस में सिन्गैस के अधिक उपयोग से ईंधन दक्षता बढ़ेगी और उत्सर्जन कम होगा।
आगे की चुनौतियाँ
हालांकि कंपनी अतीत में फॉरेक्स उल्लंघन और कोयला ब्लॉक आवंटन जैसे आरोपों से गुजरी है, यह प्रोजेक्ट टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबिलिटी पर केंद्रित है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कोल गैसिफिकेशन टेक्नोलॉजी वित्तीय रूप से कितनी मजबूत और स्केलेबल साबित होती है, खासकर कोयले की बदलती कीमतों और पर्यावरणीय नियमों को देखते हुए।
इंडस्ट्री परिदृश्य
Jindal Steel का कोल गैसिफिकेशन DRI प्रोडक्शन में कदम अनोखा है। वहीं, प्रतिद्वंद्वी टाटा स्टील (Tata Steel) और जेएसडब्ल्यू स्टील (JSW Steel) भी सस्टेनेबिलिटी पर जोर दे रहे हैं। टाटा स्टील कार्बन इंटेंसिटी को कम करने और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में अग्रणी है, जबकि जेएसडब्ल्यू स्टील क्षमता विस्तार और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। दोनों कंपनियाँ कुशल प्लांट और हरित प्रथाओं में निवेश कर रही हैं।
मुख्य आंकड़े
- कुल निवेश: कोल गैसिफिकेशन DRI प्लांट में $12 बिलियन का निवेश।
- सस्टेनेबिलिटी लक्ष्य: 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 35% की कमी और 2047 तक नेट-जीरो हासिल करना।
भविष्य की दिशा
- व्यापक अपनाव: यह देखना होगा कि क्या अन्य भारतीय स्टील कंपनियाँ समान कोल गैसिफिकेशन टेक्नोलॉजी अपनाती हैं, संभवतः सरकारी योजनाओं जैसे नेशनल कोल गैसिफिकेशन मिशन से बढ़ावा मिलेगा।
- टेक्नोलॉजी प्रगति: Jindal Steel के क्लीन टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबिलिटी को अपने ऑपरेशंस में इंटीग्रेट करने के प्रयासों पर नज़र रखें।
- सरकारी समर्थन: कोल गैसिफिकेशन प्रोजेक्ट्स के लिए सरकारी नीतियों और प्रोत्साहनों पर नजर रखें, जो इनके व्यापक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- प्लांट का प्रदर्शन: प्लांट के ऑपरेशंस, लागत दक्षता और कंपनी के कुल कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में इसकी भूमिका पर गौर करें।
