BPCL ने ओडिशा के बरगढ़ में अपनी दूसरी पीढ़ी (2G) की बायोएथेनॉल रिफाइनरी को सफलतापूर्वक चालू कर दिया है। 100 KL/दिन (किलो लीटर प्रतिदिन) की उत्पादन क्षमता वाली यह नई यूनिट, चावल की पराली जैसे कृषि अपशिष्टों का उपयोग करके फ्यूल-ग्रेड बायोएथेनॉल का निर्माण करेगी। यह सुविधा एडवांस्ड लिग्नोसेल्युलोसिक टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जिसमें जटिल प्रीट्रीटमेंट और फर्मेंटेशन प्रक्रियाएं शामिल हैं, और यह एक जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) प्लांट है, जो पर्यावरण पर कम से कम असर सुनिश्चित करता है। इस प्रोजेक्ट के निर्माण के दौरान 2 करोड़ लॉस्ट टाइम एक्सीडेंट-फ्री (LTA-free) मैन-आवर का रिकॉर्ड हासिल हुआ, जो सुरक्षा के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
यह कदम भारत के महत्वाकांक्षी E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसका लक्ष्य 2025 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल का मिश्रण प्राप्त करना है। यह पहल नेशनल बायोफ्यूल्स पॉलिसी के साथ पूरी तरह से मेल खाती है और कृषि अपशिष्ट को मूल्यवान ईंधन में परिवर्तित करके एक सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देती है, जिससे एमिशन कम होते हैं और फॉसिल फ्यूल्स पर निर्भरता घटती है। यह प्लांट सस्टेनेबल बायोएथेनॉल उत्पादन और वेस्ट-टू-फ्यूल कन्वर्जन में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के सफल कार्यान्वयन का एक बेहतरीन उदाहरण है।
BPCL भारत की एनर्जी ट्रांज़िशन और बायोफ्यूल पहलों में एक सक्रिय भागीदार रहा है। कंपनी 2025 तक E20 के राष्ट्रव्यापी रोलआउट की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए अपने इथेनॉल स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का लगातार विस्तार कर रही है। देश की नेशनल बायोफ्यूल पॉलिसी लगातार 2G बायोफ्यूल्स के उपयोग पर जोर देती रही है, जिसका उद्देश्य वेस्ट बायोमास का प्रभावी ढंग से उपयोग करना है। 2025 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए इथेनॉल उत्पादन क्षमता में भारी वृद्धि की आवश्यकता है। बरगढ़ रिफाइनरी BPCL के इंटीग्रेटेड 1G-2G बायोएथेनॉल प्रोजेक्ट का एक अभिन्न अंग है, जो इस तरह की एकीकृत सुविधाओं में कंपनी को अग्रणी बनाता है।
इस नई रिफाइनरी का चालू होना कई मायनों में महत्वपूर्ण है: यह भारत के बायोफ्यूल लक्ष्यों और ऊर्जा सुरक्षा में BPCL के योगदान को काफी बढ़ाता है, गैर-खाद्य बायोमास से फ्यूल-ग्रेड बायोएथेनॉल की घरेलू उपलब्धता को बढ़ाता है, और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए एडवांस्ड लिग्नोसेल्युलोसिक टेक्नोलॉजी की व्यवहार्यता को प्रदर्शित करता है। साथ ही, यह चावल की पराली जैसे कृषि अपशिष्टों को मूल्यवान ईंधन में बदलकर सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करता है और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में BPCL की स्थिति को और पुख्ता करता है।
हालांकि, 2G बायोएथेनॉल रिफाइनरी के लिए एग्रीकल्चरल वेस्ट की एक लागत-प्रभावी और विश्वसनीय सप्लाई चेन स्थापित करना, जिसमें कलेक्शन, स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन जैसी लॉजिस्टिक्स शामिल हैं, एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। चावल की पराली में मौजूद उच्च सिलिका कंटेंट और कम बल्क डेंसिटी प्रोसेसिंग में अतिरिक्त बाधाएं पैदा कर सकती हैं। इसके अलावा, 2G इथेनॉल के उत्पादन से जुड़ी तकनीकी जोखिम और लागतें भविष्य में इसकी निरंतरता के लिए निरंतर प्रबंधन की मांग करती हैं।
इंडस्ट्री के अन्य प्रमुख ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) भी 2G इथेनॉल क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) ने पानीपत में चावल की पराली से 100 KL/दिन क्षमता वाली 2G इथेनॉल बायो-रिफाइनरी स्थापित की है, हालांकि यह फीडस्टॉक हैंडलिंग की समस्याओं के चलते फिलहाल 50% क्षमता पर काम कर रही है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) भी पंजाब के बठिंडा में पैडी स्ट्रॉ से 100 KL/दिन क्षमता वाला 2G बायो-एथेनॉल प्लांट विकसित कर रही है।
BPCL के लिए, FY25 में कंपनी का रेवेन्यू ₹5,03,000 करोड़ रहा। आगे चलकर, निवेशकों की निगाहें बरगढ़ रिफाइनरी की उत्पादन क्षमता को उसकी पूरी 100 KL/दिन की क्षमता तक बढ़ाने, चावल की पराली जैसे फीडस्टॉक की एक कंसिस्टेंट और किफायती सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए BPCL की रणनीतियों, 2G इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी नीतियों और इंसेंटिव पर, तथा भविष्य में ऐसे ही अन्य बायोफ्यूल प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं पर टिकी रहेंगी। ZLD टेक्नोलॉजी के निरंतर संचालन में परफॉरमेंस और स्केलेबिलिटी भी महत्वपूर्ण कारक होंगे।