नंबर्स क्या कहते हैं?
न्यूट्राप्लस इंडिया ने 31 दिसंबर, 2020 को समाप्त तिमाही (Q3 FY21) के नतीजे जारी किए हैं, जो बेहद चिंताजनक हैं। इस तिमाही में कंपनी का कुल रेवेन्यू घटकर सिर्फ ₹3.28 लाख (यानी ₹0.03 करोड़) रह गया, जबकि कुल खर्चे ₹17.15 लाख (यानी ₹0.17 करोड़) थे। इसके चलते कंपनी को ₹13.87 लाख (यानी ₹0.14 करोड़) का नेट लॉस हुआ, और प्रति शेयर आय (EPS) (₹0.04) रही।
पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू ₹2,190.17 लाख था, जो इस साल घटकर सिर्फ ₹3.28 लाख रह गया। यह -99.85% की भारी गिरावट है।
पूरे फाइनेंशियल ईयर (FY20) के हालात
31 मार्च, 2020 को समाप्त हुए फाइनेंशियल ईयर (FY20) के लिए, कंपनी का कुल रेवेन्यू ₹106.81 करोड़ (₹10,681.16 लाख) था, जबकि खर्चे ₹154.64 करोड़ (₹15,463.78 लाख) थे। इस अवधि में कंपनी को ₹47.83 करोड़ (₹4,782.62 लाख) का भारी-भरकम नेट लॉस हुआ था, और EPS (₹14.03) था।
मैनेजमेंट की बड़ीThe company is in a terminal state
कंपनी के मैनेजमेंट ने साफ तौर पर कहा है कि 'Going Concern' (यानी आगे भी चलते रहने की क्षमता) का कॉन्सेप्ट 'पूरी तरह खत्म' हो गया है और किसी भी रीस्ट्रक्चरिंग प्लान के लिए 'कोई उम्मीद' नहीं है। इसका मतलब है कि कंपनी को अपनी रोजी-रोटी चलाने में भारी दिक्कतें आ रही हैं और वह भविष्य में संचालन जारी रखने की स्थिति में नहीं है।
इसके अलावा, SARFESIA एक्ट के तहत कंपनी की सभी प्रॉपर्टी, प्लांट और इक्विपमेंट को जब्त कर लिया गया है। इन सब बातों को देखते हुए, यह साफ है कि कंपनी वित्तीय बर्बादी के अंतिम पड़ाव पर है। ऑडिटर की क्वालिफाइड रिपोर्ट (qualified review report) ने भी कंपनी के गवर्नेंस और कंप्लायंस से जुड़ी गंभीर समस्याओं पर मुहर लगा दी है।
क्या है बैकग्राउंड?
न्यूट्राप्लस इंडिया काफी समय से गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही थी। FY 2019-20 में इसे नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) घोषित कर दिया गया था। सरस्वती बैंक (Saraswat Bank) के ₹76.24 करोड़ के लोन पर डिफॉल्ट करने के बाद SARFESIA एक्ट के तहत इसके एसेट्स जब्त कर लिए गए थे। ऑडिटर लगातार कंपनी की 'Going Concern' क्षमता पर सवाल उठाते रहे हैं। पहले भी कंपनी सेबी (SEBI) जैसे नियामकों के जांच के दायरे में रह चुकी है, जहां उसे स्टॉक प्राइस मैनिपुलेशन के लिए जुर्माना भी भरना पड़ा था।
अब आगे क्या?
- शेयरहोल्डर्स को अपने निवेश का लगभग पूरा पैसा डूबने का खतरा है, क्योंकि कंपनी के चलने की उम्मीद खत्म हो गई है।
- कंपनी पर चल रहे किसी भी कर्ज को चुकाने या रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने की क्षमता लगभग खत्म है।
- परिचालन क्षमता और रीस्ट्रक्चरिंग की उम्मीद न होने के कारण कंपनी के लिक्विडेशन (liquidation) में जाने की संभावना काफी अधिक है।
- क्रेडिटर्स और बैंकर्स को भी पैसे की रिकवरी में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि एसेट्स पहले ही जब्त हो चुके हैं।
