SEBI द्वारा 'Large Corporate' के तौर पर वर्गीकृत होने के अपने फायदे और नुकसान होते हैं, जो कंपनियों को डेट मार्केट (Debt Market) में फंड जुटाने के नियमों को प्रभावित करते हैं। Khaitan Chemicals & Fertilizers (KCF) ने अब यह साफ कर दिया है कि वे अगले फाइनेंशियल ईयर (FY27) के लिए इस कैटेगरी में नहीं आएंगे, भले ही उनका बकाया कर्ज ₹200.30 करोड़ तक पहुंच गया हो।
क्यों मिली छूट?
SEBI के नियमों के मुताबिक, 'Large Corporate' की कैटेगरी में आने के लिए नेट वर्थ (Net Worth) और आउटस्टैंडिंग बरोइंग (Outstanding Borrowing) दोनों शर्तों को पूरा करना होता है। 31 मार्च 2026 तक KCF पर ₹200.30 करोड़ का बरोइंग था, जो नियम के तहत ₹100 करोड़ के आंकड़े से ज्यादा है। लेकिन, ऐसा माना जा रहा है कि कंपनी नेट वर्थ की जरूरत को पूरा नहीं कर पा रही है, जो आमतौर पर ₹250 करोड़ या उससे अधिक होती है। इस वजह से, कंपनी को 'Large Corporate' नहीं माना जाएगा।
'Large Corporate' स्टेटस का महत्व
SEBI ने यह वर्गीकरण नवंबर 2018 में शुरू किया था। 'Large Corporate' मानी जाने वाली कंपनियों को नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (NCDs) जैसे पब्लिक डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Public Debt Instruments) जारी करते समय कुछ खास कंप्लायंस और डिस्क्लोजर (Disclosures) नियमों का पालन करना पड़ता है। KCF के इस कैटेगरी में न आने का मतलब है कि उन्हें इन अतिरिक्त नियमों का पालन करने की जरूरत नहीं होगी, जिससे उनके लिए फंड जुटाना आसान हो जाएगा।
कंपनी की स्थिति और भविष्य
India Ratings and Research ने KCF की क्रेडिट रेटिंग को IND BBB/Stable/IND A3+ बरकरार रखा है। यह राहत कंपनी को अपनी फाइनेंसिंग स्ट्रेटेजी (Financing Strategy) में अधिक लचीलापन (Flexibility) देगी। वहीं, सेक्टर की बड़ी कंपनियां जैसे UPL Ltd, Deepak Fertilizers and Petrochemicals Corporation Ltd, Rallis India Ltd, और PI Industries Ltd आम तौर पर 'Large Corporate' कैटेगरी में आती हैं, जिनका कर्ज अक्सर हजारों करोड़ रुपये में होता है। KCF का यह फैसला उन्हें इन बड़ी कंपनियों से रेगुलेटरी (Regulatory) स्तर पर अलग करता है।
