SBI पर ₹63,375 करोड़ का भारी टैक्स नोटिस! बैंक ने दी चुनौती, जानें पूरा मामला

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
SBI पर ₹63,375 करोड़ का भारी टैक्स नोटिस! बैंक ने दी चुनौती, जानें पूरा मामला
Overview

भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के निवेशकों के लिए एक बड़ी खबर है। बैंक को इनकम टैक्स विभाग से असेसमेंट ईयर 2023-24 के लिए **₹63,375 करोड़** (ब्याज सहित) की भारी टैक्स डिमांड का नोटिस मिला है। SBI ने इस ऑर्डर को चुनौती देने का फैसला किया है और कहा है कि इसका कंपनी के ऑपरेशंस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

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SBI ने 20 मार्च, 2024 को स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में बताया कि उसे 19 मार्च, 2024 को इनकम टैक्स विभाग से एक टैक्स डिमांड ऑर्डर मिला है। इस ऑर्डर के तहत असेसमेंट ईयर (AY) 2023-24 के लिए कुल ₹63,375,252,550 (तिरेषठ हजार तीन सौ पैंसठ करोड़ रुपये से ज्यादा) का भुगतान करने को कहा गया है, जिसमें इंटरेस्ट भी शामिल है।

यह टैक्स डिमांड इनकम टैक्स विभाग द्वारा असेसमेंट प्रोसीडिंग्स (assessment proceedings) के दौरान कुछ खर्चों को डिसअलॉ (disallow) किए जाने के कारण आई है।

SBI इस ऑर्डर के खिलाफ अपील अथॉरिटीज (appellate authorities) के पास तय समय-सीमा में अपील करने का इरादा रखती है। बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस नोटिस का उसके रोजमर्रा के कामकाज या ऑपरेशंस पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इस डिमांड का महत्व

अगर SBI की अपील नाकाम रहती है, तो यह एक बहुत बड़ी देनदारी (liability) साबित हो सकती है। यह मामला बार-बार सामने आने वाले टैक्स डिस्प्यूट्स (tax disputes) को लेकर चिंता बढ़ाता है, खासकर तब जब बैंक का इतिहास ऐसे टैक्स विवादों से जुड़ा रहा है।

पिछले टैक्स विवाद

SBI, जो देश का सबसे बड़ा पब्लिक सेक्टर बैंक है, का टैक्स विवादों का एक लंबा इतिहास रहा है। असेसमेंट ईयर 2013-14 के एक मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने SBI को कर्मचारियों के लिए TDS (Tax Deducted at Source) नहीं काटने के कारण 'assessee in default' के तौर पर बरकरार रखा था।

इससे पहले, SBI ONGC के साइट रेस्टोरेशन फंड (Site Restoration Fund - SRF) को लेकर एक बड़े TDS डिस्प्यूट में भी शामिल रहा था, जहां टैक्स, इंटरेस्ट और पेनाल्टी का कुल अनुमानित बोझ कई असेसमेंट इयर्स के लिए ₹1,000 करोड़ से अधिक था।

दूसरे पब्लिक सेक्टर बैंकों को भी इसी तरह की बड़ी टैक्स डिमांड का सामना करना पड़ा है। उदाहरण के लिए, बैंक ऑफ इंडिया (Bank of India) को AY 2016-17 के लिए ₹1,127.72 करोड़ का डिमांड नोटिस मिला था।

ग्रुप कंपनी SBI लाइफ इंश्योरेंस को भी FY 2021-22 के लिए ₹5,000 करोड़ से अधिक की टैक्स डिमांड झेलनी पड़ी थी। हालांकि, बाद में रेक्टिफिकेशन (rectification) के ज़रिये इसे काफी हद तक कम कर दिया गया था, लेकिन कंपनी ने अपनी अपील जारी रखी।

SBI के अगले कदम

SBI अब इनकम टैक्स विभाग के इस ऑर्डर को चुनौती देने के लिए अपनी औपचारिक अपील प्रक्रिया शुरू करेगी। अपील के नतीजों के आधार पर बैंक को अपनी वित्तीय स्टेटमेंट्स में प्रोविज़न (provision) करने की ज़रूरत पड़ सकती है।

संभावित जोखिम

सबसे बड़ा जोखिम यह है कि अगर SBI की अपील असफल रहती है, तो इसका कंपनी की वित्तीय स्थिति पर बुरा असर पड़ सकता है। इसके अलावा, अगर ये विवाद लगातार जारी रहते हैं, तो रेपुटेशनल रिस्क (reputational risk) और लंबे समय तक चलने वाले टैक्स लिटिगेशन (litigation) से भी निपटना पड़ेगा।

सहकर्मियों की डिमांड्स

बैंक ऑफ इंडिया की ₹1,127.72 करोड़ की डिमांड (AY 2016-17 के लिए) दिखाती है कि PSU बैंकों के लिए बड़े टैक्स लायबिलिटी कोई नई बात नहीं है। SBI लाइफ इंश्योरेंस का मामला भी वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में इस तरह के पैटर्न को दर्शाता है।

वित्तीय संदर्भ

SBI की कंटिंजेंट लायबिलिटीज (contingent liabilities) Q3 FY26 के अनुसार ₹27,42,584 करोड़ थीं।

निवेशकों का ध्यान

निवेशक इस टैक्स डिमांड के खिलाफ SBI की अपील की प्रगति पर बारीकी से नज़र रखेंगे। डिसअलॉएंंस (disallowances) के कारणों और अपील की कार्यवाही पर बैंक से और जानकारी आना महत्वपूर्ण होगा। इस बड़ी डिमांड को सफलतापूर्वक चुनौती देना SBI के वित्तीय भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.