यमन सरकार ने रेड सी (Red Sea) के तटों और रणनीतिक 'बाब अल-मंदेब' जलडमरूमध्य को हूती विद्रोहियों से आजाद कराने के लिए बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत की है। इस तनाव ने वैश्विक व्यापार और एनर्जी सप्लाई चेन के लिए चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिसका सीधा असर भारतीय निवेशकों और तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।
जंग का असर और रणनीतिक महत्व
यमन की 'प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल' ने आधिकारिक तौर पर रेड सी के तटों को वापस लेने के लिए एक व्यापक सैन्य अभियान छेड़ा है। इस अभियान का मुख्य लक्ष्य 'बाब अल-मंदेब' जलडमरूमध्य (Strait) पर फिर से नियंत्रण पाना है। जुलाई 2026 में संयुक्त राष्ट्र (UN) समर्थित शांति समझौता टूटने के बाद से यह क्षेत्र फिर से संघर्ष का केंद्र बन गया है।
ग्लोबल ट्रेड पर खतरा
बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य एशिया और यूरोप के बीच व्यापार की एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा है। हूती बलों द्वारा तटीय क्षेत्रों पर कब्जा करने और ताएज़ (Taiz) तथा अदन (Aden) के बीच आपूर्ति मार्ग बाधित होने से शिपिंग कंपनियों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से घूमकर जाना पड़ सकता है, जिससे माल ढुलाई का खर्च (Freight Cost) काफी बढ़ जाएगा।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है, इसलिए मिडिल ईस्ट में किसी भी प्रकार की भू-राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है।
- क्रूड ऑयल: किसी भी बड़े तनाव से तेल की कीमतों में 'रिस्क प्रीमियम' जुड़ सकता है, जो महंगाई को बढ़ा सकता है।
- ऑपरेटिंग मार्जिन: लॉजिस्टिक्स और ईंधन पर निर्भर भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बन सकता है।
फिलहाल, बाजार की नजरें क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम और रेड सी से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा पर टिकी हैं।
