WTO MC14: भारत की ठोस मांग! Dispute System को सुधारें, E-commerce Duty पर करें समीक्षा

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AuthorNeha Patil|Published at:
WTO MC14: भारत की ठोस मांग! Dispute System को सुधारें, E-commerce Duty पर करें समीक्षा
Overview

WTO के MC14 सम्मेलन में भारत ने एक बार फिर अपनी आवाज बुलंद की है। देश एक काम करने वाले WTO Dispute System की बहाली और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी (customs duty) के बैन (moratorium) की समीक्षा की मांग कर रहा है। भारत विकसित देशों द्वारा स्थायी ड्यूटी छूट (permanent duty waivers) के प्रस्ताव का विरोध कर रहा है।

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WTO MC14: ग्लोबल ट्रेड नियमों पर मंथन, भारत की अहम भूमिका

विश्व व्यापार संगठन (WTO) की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) ग्लोबल ट्रेड के नियमों में सुधार के लिए एक अहम मंच है। भारत, जिसका नेतृत्व वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal कर रहे हैं, सम्मेलन में पुरजोर तरीके से अपनी बात रख रहा है। भारत की मुख्य मांगों में एक मजबूत और काम करने वाले WTO Dispute Settlement System की तत्काल बहाली और इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी (customs duty) के स्थगन (moratorium) की समीक्षा शामिल है। भारत विकसित देशों द्वारा स्थायी e-commerce ड्यूटी छूट (permanent duty waivers) के प्रस्ताव का कड़ा विरोध कर रहा है, जो विकासशील देशों की जरूरतों और पॉलिसी फ्लेक्सिबिलिटी को प्रभावित कर सकता है। यह सम्मेलन ट्रेड इम्बैलेंस और सप्लाई चेन सिक्योरिटी जैसी गहरी समस्याओं से भी जूझ रहा है।

Dispute System को फिर से जिंदा करने की जरूरत

अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली की रीढ़, WTO का Dispute Settlement Mechanism, 2019 से प्रभावी रूप से निष्क्रिय पड़ा है। इसका मुख्य कारण अमेरिका द्वारा Appellate Body में नियुक्तियों को बाधित करना है। इससे किसी देश के खिलाफ आए फैसले को अनिश्चित काल तक अपील किया जा सकता है, जिससे वे लागू नहीं हो पाते और नियम-आधारित व्यापार प्रणाली कमजोर होती है। भारत, चीन और यूरोपीय संघ (EU) जैसे कई सदस्य देश इस सिस्टम की स्वचालित और बाध्यकारी प्रकृति को बहाल करने की वकालत कर रहे हैं। EU ने चेतावनी दी है कि निष्क्रियता WTO को 'अप्रासंगिक' बना सकती है।

E-commerce Duty: डिजिटल ट्रेड पर बड़ी बहस

MC14 में एक प्रमुख मुद्दा इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर 1998 से लागू कस्टम ड्यूटी (customs duty) के स्थगन (moratorium) को लेकर है। अमेरिका इस बैन को स्थायी बनाने का पक्षधर है, ताकि डिजिटल ट्रेड में स्थिरता बनी रहे। हालांकि, भारत, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे विकासशील देश इसका विरोध कर रहे हैं। भारत का तर्क है कि यह स्थगन विकसित देशों के टेक दिग्गजों को फायदा पहुंचाता है और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को अरबों डॉलर के संभावित टैक्स राजस्व का नुकसान होता है। अनुमान है कि अकेले भारत को सालाना लगभग $1.5 बिलियन का नुकसान हो सकता है। भारत अपने डिजिटल उद्योग को विकसित करने के लिए यह अवसर गंवाना नहीं चाहता।

विकासशील देशों की चिंताओं पर भी जोर

केवल Dispute System और E-commerce Duty ही नहीं, भारत MC14 में खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक खाद्य भंडारण (public food stockpiling) पर एक स्थायी समाधान और मत्स्य पालन (Fisheries) सब्सिडी जैसे विकास-केंद्रित मुद्दों पर भी जोर दे रहा है। विकासशील देश इन कार्यक्रमों को अपनी खाद्य सुरक्षा और छोटे किसानों के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं, जबकि कुछ विकसित देश बाजार मूल्य समर्थन पर चिंताओं को व्यक्त करते हैं।

WTO सुधार के अलग-अलग विज़न

EU, चीन और अमेरिका सहित कई देश WTO में सुधार चाहते हैं, लेकिन उनके विचार अलग-अलग हैं। भारत और अन्य विकासशील देश विकास संबंधी चिंताओं और आम सहमति से लिए गए निर्णयों को प्राथमिकता देते हैं। दूसरी ओर, अमेरिका छोटे देशों के समूहों के बीच समझौतों को बढ़ावा दे रहा है और पारंपरिक MFN सिद्धांत को चुनौती दे रहा है। यह सब वैश्विक ट्रेड असंतुलन, नाजुक सप्लाई चेन और बढ़ते संरक्षणवाद के बीच हो रहा है, जिससे आम सहमति बनाना एक बड़ी चुनौती है। MC14 के परिणाम भविष्य के सुधारों की दिशा तय करेंगे।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.