ई-कॉमर्स मोरैटोरियम का अंत: 26 साल बाद बड़ा बदलाव
यह ई-कॉमर्स मोरैटोरियम 1998 से लागू था, जिसका मकसद WTO सदस्य देशों के बीच डिजिटल ट्रांसमिशन (जैसे कि संगीत, सॉफ्टवेयर, ई-बुक्स) पर कस्टम ड्यूटी लगाने से रोकना था। लेकिन, WTO के 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में सदस्य देश इस पर एक राय नहीं बना सके। अमेरिका चाहता था कि इस रोक को स्थायी कर दिया जाए, लेकिन ब्राजील ने इसके लिए कृषि वार्ता में कुछ रियायतें मांगीं। वहीं, भारत और कुछ अन्य विकासशील देश भी अपनी नीतियों और राजस्व के लिए कुछ लचीलापन चाहते थे। इस मतभेद ने डेवलप्ड और डेवलपिंग देशों के बीच डिजिटल ट्रेड को लेकर चल रही गहरी खाई को उजागर कर दिया है।
मुख्य विवाद और सदस्य देशों की अलग-अलग राहें
MC14 में गतिरोध की मुख्य वजह वैश्विक व्यापार के भविष्य को लेकर सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद रहे। अमेरिका ने जहां ई-कॉमर्स मोरैटोरियम को स्थायी बनाने और TRIPS नॉन-वायलेशन कंप्लेंट रूल्स पर रोक हटाने की वकालत की, वहीं भारत जैसे देशों ने अपनी घरेलू नीतियों के लिए लचीलेपन और राजस्व की जरूरत पर जोर दिया। भारत ने चीन समर्थित 'इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट एग्रीमेंट' को भी आगे बढ़ाने का विरोध किया। यूरोपीय संघ (EU) और चीन डिजिटल ट्रेड नियमों को बेहतर बनाने के पक्ष में दिखे, लेकिन अमेरिका का सख्त रवैया मल्टीलेटरल सिस्टम के प्रति उसकी बढ़ती हताशा को दर्शाता है। इन सबके बीच, बढ़ता जियोपॉलिटिकल टेंशन और प्रोटेक्शनिज़्म (संरक्षणवाद) कई देशों को द्विपक्षीय (बायलैट्रल) और बहुपक्षीय (प्लूरिलैट्रल) समझौतों की ओर धकेल रहा है।
WTO की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल
WTO की अपने सदस्यों के बीच आम सहमति बनाने की क्षमता गंभीर खतरे में है। इसका निर्णय लेने का तरीका, जो पुरानी व्यवस्था के लिए बना था, अब डिजिटल ट्रेड जैसे आधुनिक मुद्दों पर बाधा बन रहा है। अमेरिका का यह रुख, कि अगर WTO उसके हितों का ध्यान नहीं रखता तो वह इसे कम प्रासंगिक बना सकता है, यह मल्टीलेटरल सिस्टम से दूरी का संकेत हो सकता है। ई-कॉमर्स मोरैटोरियम का खत्म होना वैश्विक डिजिटल इकोनॉमी को खंडित कर सकता है, जिससे व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ सकती है, खासकर विकासशील देशों में। TRIPS नॉन-वायलेशन कंप्लेंट मोरैटोरियम का खत्म होना भी चिंताजनक है। इससे विकासशील देशों की दवाओं जैसी महत्वपूर्ण नीतियों को विकसित देशों द्वारा चुनौती दी जा सकती है। यह सब मिलकर एक ऐसे व्यापारिक परिदृश्य की ओर ले जा रहा है जहां 66 सदस्य देशों ने आम सहमति को दरकिनार करते हुए अलग-अलग समझौते अपनाए हैं, जो WTO के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है।
आगे का रास्ता: अनिश्चितता और खंडन
जिनेवा में बातचीत जल्द फिर से शुरू होगी, लेकिन सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद बताते हैं कि मल्टीलेटरल कंसेंसस (आम सहमति) तुरंत वापस आने की उम्मीद कम है। ऐसे में, प्लूरिलैट्रल एग्रीमेंट्स और रीजनल ब्लॉक्स की ओर झुकाव बढ़ने की संभावना है, जिससे वैश्विक व्यापार व्यवस्था और खंडित हो सकती है। MC14 की यह विफलता साफ तौर पर दर्शाती है कि WTO अपनी प्रासंगिकता और प्रभावशीलता के मामले में आज की आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच एक बड़े संकट का सामना कर रहा है।