अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने बेंजामिन नेतन्याहू के पुनर्निर्वाचन का समर्थन करने से साफ इनकार कर दिया है। ट्रंप प्रशासन से अलग उनकी यह राय मध्य-पूर्व में भविष्य की विदेश नीति और बाजार की स्थिरता को लेकर नए सवाल खड़े कर रही है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance का बेंजामिन नेतन्याहू को समर्थन न देने का ऐलान ट्रंप प्रशासन की स्थापित नीतियों से एक बड़ा अलगाव है। यह निर्णय तब सामने आया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अक्सर नेतन्याहू के कार्यकाल की खुलकर सराहना की है।\n\n### क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव\nमार्केट के लिहाज से अमेरिका और इजरायल के संबंध मिडिल ईस्ट में स्थिरता के बड़े पैमाने हैं। इस क्षेत्र में होने वाला कोई भी भू-राजनीतिक बदलाव सीधे तौर पर ग्लोबल एनर्जी कीमतों और डिफेंस सेक्टर की रणनीति को प्रभावित करता है। Vance का यह स्टैंड यह संकेत देता है कि वह अपनी प्राथमिकताएं घरेलू अमेरिकी राजनीति और मिड-टर्म चुनावों पर केंद्रित रख रहे हैं, जो अमेरिकी विदेश नीति में अनिश्चितता पैदा कर सकता है।\n\n### पुराने मतभेद और तल्खी\nयह असहजता अचानक नहीं है। Vance का इजरायली राजनीतिक तंत्र के प्रति पहले भी आलोचनात्मक रुख रहा है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू के कैबिनेट के उन सदस्यों पर निशाना साधा था जिन्होंने ईरान के साथ कूटनीतिक प्रयासों का विरोध किया था। ऐसे में उनके पुराने बयान अब एक बार फिर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गए हैं।\n\n### निवेशकों के लिए जोखिम\nडिफेंस और एनर्जी सेक्टर से जुड़ी कंपनियां अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर कड़ी नजर रखती हैं। नेतृत्व के स्तर पर विदेश नीति में विरोधाभासी संकेतों से ग्लोबल ट्रेड और निवेश के माहौल में 'वेट एंड वॉच' की स्थिति बन सकती है। यह घटनाक्रम एडमिनिस्ट्रेशन के भीतर मिडिल ईस्ट रणनीति को लेकर आने वाले समय में टकराव का संकेत भी हो सकता है।\n\n### आगे क्या होगा?\nनिवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि क्या यह उपराष्ट्रपति का व्यक्तिगत फैसला है या प्रशासन की नीति में कोई बड़ा बदलाव आ रहा है। अगर अन्य अधिकारी भी इसी लीक पर चलते हैं, तो इससे इजरायल-अमेरिका संबंधों में अनिश्चितता और बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर भविष्य के कारोबारी समझौतों पर पड़ना तय है।
