अमेरिकी प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ **30-वर्षीय** सिविलियन न्यूक्लियर एग्रीमेंट को कांग्रेस के पास **90-दिनों** की समीक्षा के लिए भेजा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस डील को सऊदी-इजरायल के बीच सामान्य संबंधों (Normalization) से जोड़ दिया है, जिससे इस समझौते पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।
अमेरिकी सरकार ने आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब के साथ एक वर्गीकृत सिविलियन न्यूक्लियर एग्रीमेंट को कांग्रेस को सौंप दिया है। 'एटॉमिक एनर्जी एक्ट' के तहत अब 90-दिनों की अनिवार्य समीक्षा प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह 30-साल लंबा समझौता जुलाई 2026 में अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान के बीच हुआ था। यदि इस समयावधि के दौरान कांग्रेस के दोनों सदन इसे नामंजूर नहीं करते हैं, तो यह डील अंतिम रूप से लागू हो जाएगी।
नॉर्मलाइजेशन का अड़ंगा
फिलहाल यह परमाणु सहयोग कूटनीतिक गतिरोध में फंसा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया है कि इस समझौते की मंजूरी सऊदी अरब द्वारा 'अब्राहम एकॉर्ड्स' (Abraham Accords) में शामिल होने और इजरायल के साथ राजनयिक संबंध सामान्य करने पर ही निर्भर करेगी। वहीं, सऊदी सरकार का स्टैंड स्पष्ट है कि इजरायल को मान्यता देने से पहले एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य का निर्माण जरूरी है। इजरायली नेतृत्व के मौजूदा सुरक्षा रुख के साथ सऊदी अरब की यह शर्त फिलहाल मेल नहीं खा रही है।
सुरक्षा और परमाणु प्रसार की चिंताएं
इस कूटनीतिक मुद्दे से इतर, अमेरिकी कानून निर्माता इस समझौते की तकनीकी और सुरक्षा पहलुओं पर सवाल उठा रहे हैं। कई सांसदों को डर है कि यह समझौता सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन (Uranium enrichment) की क्षमताओं को बढ़ा सकता है। क्षेत्रीय हथियारों की होड़ (Arms race) को रोकने के लिए मौजूद सुरक्षा मानकों की पर्याप्तता पर भी बहस छिड़ी हुई है। समझौते के अत्यधिक गोपनीय होने के कारण इन आशंकाओं ने और जोर पकड़ लिया है।
इन्वेस्टर्स और ग्लोबल मार्केट के लिए यह स्थिति मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव को दर्शाती है। इस समीक्षा का परिणाम अमेरिका-सऊदी रणनीतिक साझेदारी को प्रभावित कर सकता है, जो वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की नींव है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स को आने वाले दिनों में कांग्रेस के सत्रों और व्हाइट हाउस की तरफ से आने वाले आधिकारिक बयानों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
