अमेरिका का 'लेन-देन' वाला रवैया
अमेरिकी डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट क्रिस्टोफर लैंडॉ (Christopher Landau) ने रायसीना डायलॉग (Raisina Dialogue) में जो बातें कहीं, वे दोनों देशों के बीच संबंधों में एक बड़े बदलाव का संकेत देती हैं। उन्होंने कहा कि अब वो समय बीत गया है जब उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ बिना किसी खास शर्त के तालमेल बिठाया जाता था। लैंडॉ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वाशिंगटन "भारत के साथ वही गलती नहीं दोहराएगा जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी"। इसका मुख्य मकसद भारत के बढ़ते प्रभाव को ऐसे मैनेज करना है ताकि वह भविष्य में अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी न बन सके। अब यह साझेदारी सिर्फ साझा मूल्यों पर आधारित नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से परिभाषित राष्ट्रीय हितों से प्रेरित एक रणनीतिक तालमेल के तौर पर देखी जा रही है। इस रिश्ते में एक सख्त, 'डील-ओरिएंटेड' (deal-oriented) दृष्टिकोण देखने को मिलेगा, जहाँ फायदे सशर्त होंगे और अमेरिका के रणनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी जाएगी।
चीन से सबक
चीन के उदय से अमेरिका को एक बड़ा सबक मिला है। चीन को वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) में शामिल करने और उसे तरजीही व्यापार का दर्जा देने जैसे फैसलों को अब वाशिंगटन में बड़ी भूल माना जा रहा है। इन कदमों से बीजिंग की आर्थिक और वैश्विक ताकत बढ़ी, जिसका सीधा असर अमेरिका पर हुआ। पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प की 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) नीति में भी इस 'transactional' (लेन-देन) पर जोर था, जहाँ एक-एक सौदों और तात्कालिक आर्थिक फायदों को महत्व दिया गया। इसी के चलते, अब अमेरिका किसी भी उभरते राष्ट्र को अनजाने में इतना मजबूत बनाने से बच रहा है कि वह भविष्य में खुद के लिए खतरा बन जाए। भारत, अपनी विशाल आबादी और बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ, अब अमेरिका की इसी अधिक सतर्क और 'सेल्फ-सर्विंग' (self-serving) नीति का हिस्सा है।
भारत की भूमिका
भारत का कूटनीतिक और आर्थिक सफर अब इस नए 'transactional' माहौल में ही तय होगा। वाशिंगटन भारत की क्षमता को पहचानता है और बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में उसे एक महत्वपूर्ण सहयोगी मानता है। यह पहचान भारत को कुछ हद तक बढ़त देती है, खासकर तब जब वह अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने और बेहतर व्यापार सौदे हासिल करने की कोशिश कर रहा है। भारत ने वैश्विक व्यापार की चुनौतियों का सामना किया है, जिसका एक कारण उसकी मजबूत घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र का विस्तार है। भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा व्यापार सौदों पर बातचीत महत्वपूर्ण है। भारतीय अधिकारी अच्छे सौदों की उम्मीद कर रहे हैं, जिसका मकसद वैश्विक लक्ष्यों को घरेलू जरूरतों के साथ संतुलित करना है। हालांकि, भारत को अमेरिका की उस नीति को भी ध्यान में रखना होगा जो चीन जैसे आर्थिक महाशक्ति के उदय को रोकना चाहती है। अमेरिका भारत के विकास को स्वीकार तो करता है, लेकिन चाहता है कि यह अमेरिका के हितों का सहायक हो, प्रतिद्वंद्वी नहीं।
अमेरिका के 'डील' वाले रवैये के जोखिम
अमेरिका-भारत के रिश्ते में 'transactional' प्रकृति, खासकर 'अमेरिका फर्स्ट' और वन-ऑन-वन डील्स पर केंद्रित प्रशासन के तहत, महत्वपूर्ण जोखिम लाती है। नीतियों में अचानक बदलाव और व्यापारिक असहमति अमेरिका के लिए दबाव के बिंदु बन सकती है, जिससे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुँच सकता है। हालाँकि अमेरिका भारत को एक सहयोगी के रूप में देखता है, उसका मुख्य लक्ष्य भारत को एक बराबर का प्रतिस्पर्धी बनने से रोकना है। इससे नई दिल्ली के लिए कठिन बातचीत और रणनीतिक समायोजन की उम्मीद की जा सकती है। अन्य सहयोगी देश भी इस 'transactional' रवैये का सामना कर चुके हैं, जिससे अनिश्चितता पैदा हुई और अमेरिकी अप्रत्याशितता के खिलाफ अधिक स्वतंत्रता की मांग बढ़ी। भारत का रूस और चीन जैसे देशों के साथ जुड़ाव, अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करते हुए, इस जटिल संतुलन को दर्शाता है। आलोचकों का तर्क है कि अमेरिका की ऐसी चालें सहयोगियों को अलग-थलग कर सकती हैं और उन्हें प्रतिद्वंद्वियों की ओर धकेल सकती हैं।