अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बैक-चैनल बातचीत और संभावित सैन्य तनाव ने ग्लोबल ऑयल मार्केट में अनिश्चितता पैदा कर दी है। **3 नवंबर** को होने वाले US मिड-टर्म इलेक्शन से पहले यह उठा-पटक भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल डिप्लोमेसी की खबरें सामने आ रही हैं। अमेरिकी वाइस प्रेसिडेंट JD Vance द्वारा ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी Mohsen Rezaei से संपर्क की रिपोर्ट ने बाजार का ध्यान खींचा है। वहीं, अमेरिका एक तरफ कूटनीति की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ सैन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप का आधिकारिक रुख
राष्ट्रपति Donald Trump ने इस बातचीत को केवल मानवीय आधार पर मेडिकल सप्लाई के समन्वय का नाम दिया है, जो रिपोर्ट की गई कूटनीतिक चर्चाओं से काफी अलग है। सरकारी बयानों और बैक-चैनल प्रयासों के बीच यह विरोधाभास 3 नवंबर के मिड-टर्म इलेक्शन से पहले तनाव को और बढ़ा रहा है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
भारत अपनी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात के जरिए पूरा करता है। मिडिल ईस्ट में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई या कूटनीतिक अनिश्चितता सीधे तौर पर ग्लोबल ऑयल प्राइसेज को प्रभावित करती है।
- इंपोर्ट बिल पर असर: कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ेगा, जो रुपये की स्थिरता और करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव डाल सकता है।
- सेक्टर पर दबाव: एविएशन, पेंट्स और केमिकल जैसे सेक्टर, जो तेल डेरिवेटिव्स पर निर्भर हैं, उनके मार्जिन पर बुरा असर पड़ सकता है।
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: यह समुद्री मार्ग ग्लोबल ऑयल शिपमेंट के लिए लाइफलाइन है। ईरान द्वारा इसे बंद करने की धमकी ने पहले ही बाजार की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
आने वाले समय में निवेशकों को अमेरिका की फॉरेन पॉलिसी, ब्रेंट (Brent) और WTI क्रूड ऑयल की कीमतों और भारतीय सरकार के एनर्जी सिक्योरिटी प्लान पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
