हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव के चलते ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें **$4** प्रति बैरल उछल गई हैं। इस पांच हफ्ते की ऊंचाई से भारतीय एविएशन, ऑयल मार्केटिंग और लॉजिस्टिक सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है।
दुनिया के सबसे अहम एनर्जी ट्रांजिट रूट 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने ग्लोबल मार्केट में हलचल मचा दी है। बुधवार को कच्चे तेल की कीमतों में $4 से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई, जो पिछले 5 हफ्तों का उच्चतम स्तर है।
क्यों बढ़ रहा है डर?
ईरान के सिरीक (Sirik) में हवाई हमले और उसके बाद जॉर्डन, बहरीन व इराक में अमेरिकी संपत्ति पर ईरान की जवाबी कार्रवाई से निवेशक डरे हुए हैं। हॉर्मुज रूट से दुनिया भर में तेल की सप्लाई होती है। अगर यह विवाद लंबा खिंचता है और तेल टैंकरों की आवाजाही रुकती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और भी आग लग सकती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर भारत के इंपोर्ट बिल को बढ़ाएगा, जिसका असर करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर पड़ सकता है। साथ ही, रुपये की कमजोरी और बढ़ती महंगाई भी सरकार के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
कौन से सेक्टर रहेंगे रडार पर?
- ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs): अगर कंपनियां कच्चे तेल के बढ़े दाम ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो उनके मार्जिन पर बुरा असर पड़ेगा।
- एविएशन सेक्टर: फ्यूल की कीमत यानी एटीएफ (ATF) का खर्च एयरलाइन्स के कुल ऑपरेटिंग खर्च का एक बड़ा हिस्सा होता है। तेल महंगा होने से मुनाफे में भारी गिरावट तय है।
- लॉजिस्टिक्स और शिपिंग: मिडल ईस्ट में तनाव बढ़ने से शिपिंग इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ जाएंगे, जिससे माल ढुलाई का किराया (Freight Rates) और महंगा हो सकता है।
फिलहाल स्थिति काफी तनावपूर्ण बनी हुई है। निवेशकों को सलाह है कि वे ग्लोबल क्रूड प्राइसेस और शिपिंग लेन की खबरों पर पैनी नजर रखें।
