US-Iran संघर्ष को 6 महीने बीत चुके हैं और अब यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध अपराधों की कानूनी जांच के दायरे में आ गया है। भारतीय निवेशकों के लिए यह तनाव कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई और महंगाई के मोर्चे पर बड़ा रिस्क पैदा कर रहा है।
फरवरी 2026 में शुरू हुए US-Iran संघर्ष ने अब एक गंभीर मोड़ ले लिया है। अंतरराष्ट्रीय कानूनी विशेषज्ञ सैन्य अभियानों के दौरान नागरिक बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान और 'रूल्स ऑफ एंगेजमेंट' पर सवाल उठा रहे हैं। चर्चा के केंद्र में मिनाब स्थित 'शजरेह तय्येबेह गर्ल्स एलिमेंट्री स्कूल' पर हुआ एयरस्ट्राइक है। हालांकि रिपोर्ट्स में माना गया है कि यह अमेरिकी 'टॉमहॉक मिसाइल' थी, लेकिन स्वतंत्र जांच न होने से जवाबदेही तय करना मुश्किल बना हुआ है।
भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था पर असर
भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का सबसे बड़ा विषय 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) है। भारत अपनी तेल और गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और इस समुद्री मार्ग में किसी भी तरह की रुकावट कच्चे तेल की कीमतों में आग लगा सकती है। अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल, ट्रेड डेफिसिट और घरेलू महंगाई पर पड़ेगा।
बढ़ता वित्तीय बोझ
जून 2026 तक, अमेरिका ने इस संघर्ष पर कथित तौर पर $113.3 बिलियन खर्च कर दिए हैं। सैन्य खर्च में यह बेतहाशा बढ़ोतरी ग्लोबल इकॉनमी में महंगाई को और हवा दे रही है। भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए, यह अनिश्चितता कॉरपोरेट मुनाफे और उपभोक्ता खर्च (Consumer Spending) को प्रभावित कर सकती है।
निवेशकों के लिए सलाह
बाजार के जानकारों का मानना है कि निवेशकों को फिलहाल सतर्क रहने की जरूरत है। क्रूड ऑयल की कीमतों, भारतीय इंपोर्ट कॉस्ट और डिप्लोमैटिक मोर्चे पर हो रही हलचल पर नजर बनाए रखना जरूरी है। जब तक तनाव कम होने के संकेत नहीं मिलते, तब तक उन सेक्टरों में निवेश को लेकर सावधानी बरतें जो आयातित ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर हैं।
