अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 'Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026' को मंजूरी दे दी है। इस बिल में भारत और चीन जैसे रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों पर **100%** तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है, जिससे भारत की ऊर्जा नीति और ट्रेड रिलेशंस के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है।
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 262-159 के बहुमत से इस नए बिल को मंजूरी दे दी है। अब यह बिल अंतिम हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा। इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस की सैन्य गतिविधियों के लिए मिलने वाले रेवेन्यू पर चोट करना है।
भारत के लिए चुनौती
जुलाई 2026 तक भारत के कुल ऑयल इंपोर्ट में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी लगभग 51% तक पहुंच गई थी। नया कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा के सबसे बड़े खरीदारों पर 100% तक ड्यूटी लगाने की discretionary पावर देता है। हालांकि, यह टैरिफ ऑटोमैटिक नहीं है, लेकिन इसमें एक एक्सेप्शन क्लॉज भी है। जो देश रूस से 15% से कम नेचुरल गैस का इंपोर्ट करते हैं और इसे घटाने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं, उन्हें राहत मिल सकती है।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या हैं संकेत?
इन्वेस्टर्स के लिए फिलहाल सबसे बड़ा रिस्क 'पॉलिसी अनसर्टेनिटी' है। यदि अमेरिकी प्रशासन इस शक्ति का इस्तेमाल करता है, तो भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, यदि अमेरिका-भारत व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ता है, तो टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और टेक सर्विसेज जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स के लिए चिंता बढ़ सकती है।
मार्केट अब इस बात पर नजर रख रहा है कि क्या भारत सरकार अपनी एनर्जी इंपोर्ट स्ट्रेटेजी में कोई बदलाव करती है या कूटनीतिक बातचीत के जरिए छूट हासिल करने की कोशिश करती है।
