रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अमेरिका की विदेश नीति पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि वाशिंगटन जानबूझकर एनर्जी मार्केट में एकाधिकार (Monopoly) जमाने के लिए प्रतिबंधों (Sanctions) और व्यापारिक रुकावटों का इस्तेमाल कर रहा है। लावरोव ने कहा कि अमेरिका भारत और अन्य साझेदार देशों को किफायती रूसी ऊर्जा स्रोतों तक पहुँचने से रोक रहा है, जबकि यूरोप में पहले से ही ऐसे प्रतिबंध लागू हैं। उन्होंने इसे अमेरिका द्वारा अपनी आर्थिक ताकत बढ़ाने की सोची-समझी रणनीति बताया, जो निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के खिलाफ है। यह बयान ऐसे समय आया है जब कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें भी ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता दिखा रही हैं। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) वायदा $68.86 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा है, जबकि WTI (West Texas Intermediate) $64.19 के आसपास है। दरअसल, अमेरिका ने रूस की प्रमुख तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिसका मकसद मॉस्को की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण राजस्व को रोकना है।
लावरोव के ये आरोप अमेरिका की एक बड़ी रणनीति की ओर इशारा करते हैं। अमेरिका अपनी बढ़ती लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात क्षमता को एक फॉरेन पॉलिसी टूल के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। इसका लक्ष्य खुद को एक प्रमुख ऊर्जा सप्लायर के रूप में स्थापित करना और रूस जैसे देशों पर वैश्विक निर्भरता को कम करना है। अनुमान है कि 2029 तक अमेरिकी LNG एक्सपोर्ट दोगुना हो जाएंगे, और क्षमता विस्तार का लक्ष्य दुनिया भर के मार्केट हैं, खासकर यूरोप, जहां अमेरिकी LNG 2026 की शुरुआत तक 57% से ज्यादा हिस्सेदारी पर पहुंच गया है। इसकी तुलना में, रूसी पाइपलाइन गैस की कीमत अमेरिकी LNG से काफी कम है। 2025 के अनुमानों के मुताबिक, रूसी पाइपलाइन गैस की लागत $6–$8 प्रति MMBTU आ सकती है, जबकि यूरोप में अमेरिकी LNG इम्पोर्ट की कीमत $10–$15 प्रति MMBTU के बीच रहने की उम्मीद है।
भारत, जो अपनी 85% से अधिक कच्चे तेल की जरूरतें इम्पोर्ट करता है, उसके लिए एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) – यानी उपलब्धता, भरोसेमंदता और विविधीकरण (Diversification) – सबसे महत्वपूर्ण है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर 2022 में लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, भारत ने छूट पर मिलने वाले रूसी कच्चे तेल का इम्पोर्ट काफी बढ़ा दिया था। 2025 के मध्य तक यह 20 लाख बैरल प्रति दिन से भी ऊपर चला गया था। भारतीय अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि ऊर्जा खरीद के फैसले राष्ट्रीय हित और मार्केट की स्थितियों पर निर्भर करते हैं, न कि बाहरी राजनीतिक दबाव पर। अगस्त 2025 में भारत के कुल कच्चे तेल इम्पोर्ट में रूस की हिस्सेदारी लगभग 38% थी, लेकिन भारत की रणनीति रूसी सप्लाई को पूरी तरह बंद करने की बजाय धीरे-धीरे विविधीकरण करने की है। जानकारों का मानना है कि भारत का यह रुख हमेशा से उसकी फॉरेन पॉलिसी में 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' (Strategic Autonomy) की नीति के अनुरूप रहा है।
इस भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Friction) से जुड़े खतरे भी कम नहीं हैं। भारत के लिए, रूसी कच्चे तेल पर अधिक निर्भरता, विविधीकरण के प्रयासों के बावजूद, द्वितीयक अमेरिकी प्रतिबंधों (Secondary U.S. Sanctions) और कीमत में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाती है। भले ही अमेरिकी LNG एक बढ़ता हुआ विकल्प है, लेकिन इसकी ऊंची कीमत भारत की विकासशील अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है। रूस, एशियाई बाजारों की ओर रणनीतिक मोड़ लेने के बावजूद, प्रतिबंधों के बीच अपने एक्सपोर्ट राजस्व को बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रहा है। भले ही वह 'शैडो फ्लीट' (Shadow Fleet) के जरिए वॉल्यूम बढ़ा रहा हो, लेकिन प्राइस कैप (Price Cap) से प्रति बैरल राजस्व कम हो सकता है। वहीं, अमेरिका की रणनीति अपनी ऊर्जा एक्सपोर्ट मार्केट और भू-राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करती है, लेकिन अगर ऊंची LNG कीमतों से उसके सहयोगी देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं या राजनयिक दबाव बहुत अधिक हो जाता है, तो यह उन्हें अलग-थलग भी कर सकता है। प्रतिस्पर्धी परिदृश्य में, जहां रूसी पाइपलाइन गैस की कीमत उपलब्ध होने पर काफी कम है, वहीं उसकी भू-राजनीतिक सीमाएं खरीदारों को महंगे लेकिन सुलभ अमेरिकी LNG की ओर धकेल रही हैं, जिससे कई उपभोक्ताओं के लिए उच्च लागत पर अमेरिकी एनर्जी डोमिनेंस (Energy Dominance) के लिए बाजार तैयार हो रहा है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि ग्लोबल एनर्जी मार्केट में भू-राजनीतिक तनाव, प्रतिबंधों के लागू होने की प्रभावशीलता और रूसी पाइपलाइन गैस बनाम अमेरिकी LNG के प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण के कारण अस्थिरता (Volatility) जारी रहेगी। भारत की ऊर्जा सुरक्षा उसकी खरीद नीतियों को तय करती रहेगी, जिसका मतलब है कि रूसी कच्चे तेल का इम्पोर्ट जारी रहने की उम्मीद है, भले ही इसमें कुछ कमी आए, साथ ही आपूर्तिकर्ताओं के आधार को व्यापक बनाने के प्रयास भी जारी रहेंगे। अमेरिका से उम्मीद है कि वह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विदेश नीति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए अपने LNG एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना जारी रखेगा। साथ ही, वह उच्च एक्सपोर्ट वॉल्यूम का घरेलू ऊर्जा लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजार स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभाव को भी प्रबंधित करेगा। पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ बाजार की मजबूती का एक प्रमुख संकेचक भारत जैसे देशों में रूसी तेल एक्सपोर्ट की दिशा होगी, जिस पर बारीकी से नजर रखी जाएगी।