अमेरिका और चीन ने अपने ट्रेड ट्रूस (Trade Truce) को जनवरी 2027 तक बढ़ा दिया है। भारतीय निवेशकों के लिए अब सबसे बड़ा रिस्क 'रूस, ईरान सैंक्शनिंग एक्ट 2026' है, क्योंकि चीन के साथ स्थिरता के बाद अमेरिका की नजर भारत के एनर्जी इंपोर्ट पर पड़ सकती है।
वॉशिंगटन में हुई हालिया समिट के बाद अमेरिका और चीन ने आधिकारिक तौर पर अपने ट्रेड ट्रूस को जनवरी 2027 तक बढ़ा दिया है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच यह समझौता भले ही फौरी तौर पर तनाव कम करता दिख रहा हो, लेकिन रणनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर कोई ठोस समाधान न निकलना ग्लोबल मार्केट के लिए अनिश्चितता का संकेत है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह चिंता का विषय?
यह विस्तार असल में व्हाइट हाउस के लिए एक 'रणनीतिक औजार' है। 'रूस, ईरान सैंक्शनिंग एक्ट 2026' के तहत अमेरिका के पास उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार है, जो रूस से कच्चा तेल खरीदते हैं। चीन को 'डिप्लोमैटिक बफर' में रखकर अमेरिका अब अपने नेशनल सिक्योरिटी वेवर्स (waivers) को अधिक आसानी से मैनेज कर पाएगा।
भारतीय बाजारों पर असर (Risk Factors)
भारत के लिए यह स्थिति सतर्क रहने वाली है। जैसे ही अमेरिका चीन के साथ अपने संबंधों को साध लेगा, संभावना है कि उसकी रेगुलेटरी नजर भारत की तरफ घूम सकती है। भारत अभी भी रूसी क्रूड का एक बड़ा आयातक है। ऐसे में अमेरिका की सेकेंडरी सैंक्शन्स की नीति भारत के ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs), बैंकों और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट पर निर्भर सेक्टरों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
आगे क्या देखें?
समिट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ताइवान जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई, लेकिन रेयर अर्थ एलिमेंट्स और टेक्नोलॉजी कॉम्पिटिशन पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। भारतीय निवेशकों के लिए अब सबसे जरूरी यह देखना होगा कि अमेरिका अगले कुछ महीनों में 2026 के सैंक्शनिंग एक्ट को कैसे लागू करता है। सरकार की तरफ से आने वाली एनर्जी इंपोर्ट कंप्लायंस से जुड़ी खबरों पर पैनी नजर रखें, क्योंकि यही भविष्य में मार्केट की चाल तय करेगी।
