US और China के बीच ट्रेड ट्रूस को **10 नवंबर** की समय सीमा से आगे **2 महीने** के लिए बढ़ा दिया गया है। राष्ट्रपति Donald Trump और Xi Jinping की शिखर वार्ता से पहले मिली इस मोहलत से ग्लोबल मार्केट में उम्मीद की किरण जगी है।
बातचीत के लिए और समय
US और China ने ट्रेड ट्रूस को 10 नवंबर की डेडलाइन से आगे बढ़ाकर 2 महीने का और वक्त ले लिया है। इस फैसले के पीछे का मकसद छोटे-मोटे समझौतों से ऊपर उठकर एक ठोस इकोनॉमिक डील पर काम करना है। ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent और चाइनीज वाइस प्रीमियर He Lifeng इस पूरी बातचीत की कमान संभाले हुए हैं ताकि प्रेसिडेंट Donald Trump और Xi Jinping की होने वाली मुलाकात के लिए जमीन तैयार की जा सके। यह खबर ग्लोबल ट्रेड के लिए स्थिरता का संकेत है, हालांकि फाइनल डील की राह अभी भी कांटों भरी है।
कृषि और कमोडिटी मार्केट पर असर
US सरकार लगातार बीजिंग पर पुराने वादों को पूरा करने का दबाव बना रही है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि जहां China ने सोयाबीन के इंपोर्ट टारगेट तो पूरे कर लिए हैं, लेकिन अन्य एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स के लिए किए गए $17 बिलियन के वादे को पूरा करने में अभी काफी पीछे है। इसके अलावा, जरूरी रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई में देरी ने भी बातचीत में रुकावट पैदा की है। वाशिंगटन ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी तरह की टैरिफ कटौती से पहले उन्हें इन वादों पर ठोस प्रगति चाहिए। इन अधूरे लक्ष्यों के कारण उन ग्लोबल कमोडिटी मार्केट्स में अनिश्चितता है जो ट्रेड पैटर्न पर निर्भर हैं।
AI का मुकाबला और टेक्नोलॉजी सेक्टर
सिर्फ फिजिकल गुड्स ही नहीं, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भी दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा का बड़ा केंद्र बन गया है। US ने AI सेफ्टी के लिए एक कम्युनिकेशन चैनल का सुझाव दिया था, लेकिन आपसी भरोसे की कमी के कारण यह प्रक्रिया ठंडी पड़ी हुई है। राष्ट्रपति Trump ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकन टेक्नोलॉजी लीडरशिप को बरकरार रखना उनकी प्राथमिकता है, जिससे साफ होता है कि दोनों देशों के रणनीतिक लक्ष्य एक-दूसरे से काफी अलग हैं। यह राइवलरी ग्लोबल टेक सेक्टर और सप्लाई चेन को सीधे प्रभावित कर रही है।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी है?
अब बाजार की नजरें आने वाले प्रेसिडेंशियल समिट पर टिकी हैं। क्या $30 बिलियन के नॉन-क्रिटिकल सामानों से टैरिफ हटेंगे या फाइनेंशियल सर्विसेज में कोई बड़ा बदलाव होगा? भारतीय निवेशकों के लिए यह जानना जरूरी है कि US-China के बीच तनाव का असर ग्लोबल मार्केट सेंटीमेंट और कमोडिटी प्राइसेज पर पड़ता है, जो भारतीय बाजार (Emerging Markets) तक लहर बनकर पहुंचता है। निवेशकों को सलाह है कि वे समिट के नतीजों और टेक पॉलिसी पर दोनों देशों के रुख पर बारीक नजर रखें।
