WTO के सिद्धांतों पर अमेरिकी प्रस्ताव
अमेरिका ने World Trade Organization (WTO) के बुनियादी सिद्धांतों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव दिया है। 14वें WTO मंत्रिस्तरीय सम्मेलन से ठीक पहले जारी किए गए इस दस्तावेज़ में Most Favored Nation (MFN) नियम के तहत नॉन-डिस्क्रिमिनेशन जैसे प्रमुख सिद्धांतों पर सवाल उठाए गए हैं। साथ ही, विकासशील देशों को मिलने वाले स्पेशल ट्रीटमेंट (S&DT) और बहुपक्षीय प्रणाली (multilateral system) के आधार, सहमति-आधारित निर्णय (consensus-based decision-making) पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए गए हैं।
अमेरिकी प्रस्ताव MFN सिद्धांत के पुनर्मूल्यांकन की वकालत करता है, जिससे व्यापारिक भागीदारों के बीच भेदभाव की अधिक स्वतंत्रता मिल सके। इसके अलावा, यह पेपर S&DT के लिए स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ मानदंड (objective criteria) तय करने की मांग करता है। इसका मकसद खुद को विकासशील देश बताने वाले बड़े देशों की जांच कर यह सुनिश्चित करना है कि प्रावधान अपने इच्छित उद्देश्य को पूरा करें।
भारत का विरोध और चिंताएं
अमेरिकी पेपर में WTO की संरचना में plurilateral agreements (कुछ सदस्यों के बीच हुए समझौते) को एकीकृत करने की भी वकालत की गई है। इस दृष्टिकोण का भारत और अन्य विकासशील देशों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है। उनका तर्क है कि बिना किसी सार्वभौमिक सहमति के plurilateral सौदों को WTO के औपचारिक ढांचे में शामिल करने से मूलभूत सिद्धांतों को कमजोर किया जा सकता है और मनमाने निर्णय लेने की प्रक्रिया (ad-hoc decision-making) को बढ़ावा मिल सकता है।
ट्रेड एक्सपर्ट बिश्वजीत धर (Biswajit Dhar) ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी प्रस्ताव ऐसी नीतियों को संस्थागत बना सकता है जिन्होंने WTO के नियम-आधारित प्रणाली को कमजोर किया है। धर के अनुसार, 'MFN को हटाकर उसे reciprocity से जोड़ना अमेरिका को देशों के साथ भेदभाव करने की स्वतंत्रता देगा।' उन्होंने यह भी कहा कि plurilaterals को बढ़ावा देने से 'अफरा-तफरी मच सकती है, क्योंकि देशों का एक समूह किसी भी समय दूसरों की सहमति के बिना किसी भी मुद्दे पर बातचीत शुरू कर सकता है।'
भारत ने प्रक्रियात्मक आधार पर लगातार ऐसे plurilateral पहलों का विरोध किया है, और स्थापित नियमों के पालन पर जोर दिया है। नई दिल्ली का कहना है कि सुधारों में 'WTO नियमों को तोड़ना' या संगठन के चरित्र को परोक्ष रूप से बदलना शामिल नहीं होना चाहिए। भारत का मानना है कि ऐसे कदम WTO को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकते हैं और इसके आधारों में विश्वास को कम कर सकते हैं। ये चल रही चर्चाएँ आगामी मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के लिए एक विवादास्पद माहौल तैयार कर रही हैं, जहाँ वैश्विक व्यापार शासन का भविष्य एक प्रमुख फोकस होगा।