UNGA में Nepal के प्रतिनिधि ने ग्लोबल ट्रेड सिस्टम पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सैन्य रसद को तरजीह दी जा रही है, जबकि खाद और ऊर्जा जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई बाधित है, जो South Asia की इकोनॉमी के लिए बड़ा रिस्क है।
न्यूयॉर्क में चल रही संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में Nepal के नेता ने ग्लोबल सप्लाई चेन की कड़वी सच्चाई को सामने रखा है। उनके संबोधन का मुख्य बिंदु यह था कि आज की दुनिया में सैन्य उपकरणों को तो सीमाओं के पार तेजी से भेजा जा रहा है, लेकिन खाद और ईंधन जैसी बुनियादी चीजों के लिए लंबी देरी का सामना करना पड़ता है। यह अक्षमता न केवल विकासशील देशों को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि हिमालयी क्षेत्र में संसाधनों की कमी भी पैदा कर रही है।
इकोनॉमी पर असर (Economic Impact)
यह सप्लाई चेन बॉटलनेक India, Bangladesh और Sri Lanka जैसे देशों के लिए सीधे तौर पर आर्थिक चुनौती बन रहे हैं। इन देशों में खेती की पैदावार काफी हद तक खाद और ऊर्जा की समय पर उपलब्धता पर टिकी है। यदि ग्लोबल सप्लाई चेन इन जरूरी सामानों को नहीं पहुंचा पाती, तो इसका सीधा असर डोमेस्टिक फूड इन्फ्लेशन पर पड़ता है, जो आम जनता की जेब पर भारी पड़ता है।
क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत (Regional Resilience)
नेपाल ने हिमालयी क्षेत्र के लिए एक 'क्लाइमेट रेजिलिएंस सिस्टम' बनाने का प्रस्ताव रखा है। हाल ही में Bhotekoshi क्षेत्र में आई बाढ़ जैसी आपदाओं ने यह साबित कर दिया है कि बुनियादी ढांचे को सुरक्षित करना कितना जरूरी है। उन्होंने India और China जैसे क्षेत्रीय शक्तियों का आह्वान किया है कि वे एक मजबूत फ्रेमवर्क तैयार करें जो जलवायु परिवर्तन के झटकों को झेल सके।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
इन्वेस्टर्स के लिए यह बदलाव महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे साउथ एशियन देशों में क्लाइमेट रिस्क बढ़ रहा है, वैसे-वैसे मॉडर्न स्टोरेज, लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर में सरकारी निवेश बढ़ने की उम्मीद है। आने वाले समय में लॉजिस्टिक्स, कंस्ट्रक्शन और एग्रीकल्चरल सपोर्ट सर्विस देने वाली कंपनियों के लिए नए अवसर खुल सकते हैं, बशर्ते क्षेत्र के देश आपस में बेहतर राजनीतिक तालमेल बिठा पाएं।
