यूके के यूनिवर्सिटीज़ को क्या सता रहा है? (The Domestic Squeeze)
यूके की हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस (Higher Education Institutions) इस समय एक दोहरी मार झेल रही हैं। एक तरफ तो वे भारी वित्तीय दबाव में हैं, और दूसरी ओर सरकार इमिग्रेशन को कम करने के सख्त कदम उठा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग आधी इंग्लिश यूनिवर्सिटीज़ के 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में घाटा (Deficit) दिखाने की उम्मीद है, और कुछ तो गंभीर लिक्विडिटी (Liquidity) की समस्या से जूझ रही हैं।
इसके पीछे मुख्य वजहें हैं: पिछले एक दशक से डोमेस्टिक ट्यूशन फीस (Domestic Tuition Fees) का महंगाई के हिसाब से न बढ़ना और ऑपरेशनल कॉस्ट (Operational Cost) का लगातार बढ़ना। ऐसे में, कई यूनिवर्सिटीज़ अपनी इनकम के लिए इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की ट्यूशन फीस पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गई हैं, जो अब सीधे सरकारी नीतियों के निशाने पर है।
इमिग्रेशन पर सख्त रवैया:
साथ ही, यूके सरकार ने इमिग्रेशन के नियमों को भी कड़ा कर दिया है। हालिया बदलावों में ज़्यादातर ग्रेजुएट्स के लिए पोस्ट-स्टडी वर्क वीज़ा (Post-Study Work Visa) की अवधि घटाकर 18 महीने करना, पढ़ाए जाने वाले पोस्टग्रेजुएट स्टूडेंट्स के लिए डिपेंडेंट्स (Dependants) पर रोक लगाना और स्टूडेंट वीज़ा (Student Visa) के लिए वित्तीय ज़रूरतों को बढ़ाना शामिल है।
इन उपायों के अलावा, अगस्त 2028 से हर इंटरनेशनल स्टूडेंट पर प्रति वर्ष £925 का नया लेवी (Levy) लगाया जाएगा। ये सभी कदम नेट इमिग्रेशन को कम करने और यूनिवर्सिटीज़ की लागत बढ़ाने के लिए उठाए जा रहे हैं, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर और दबाव पड़ रहा है। यूके की अपनी 'इंटरनेशनल एजुकेशन स्ट्रेटेजी' (International Education Strategy) भी इसी बदलाव को दर्शाती है, जो शिक्षा निर्यात को 2030 तक £40 बिलियन सालाना तक ले जाने का लक्ष्य रखती है, जबकि डोमेस्टिक स्टूडेंट नंबर्स पर फोकस कम किया गया है।
भारत में क्यों है बड़ा मौका? (Tapping India's Exploding Demand)
भारत यूके यूनिवर्सिटीज़ के लिए एक बड़ा और आकर्षक विकल्प बनकर उभरा है। अनुमान है कि 2035 तक भारत को 70 मिलियन (7 करोड़) अतिरिक्त यूनिवर्सिटी प्लेसेस (University Places) की ज़रूरत होगी। 2023 में आए सरकारी नियमों के बाद, टॉप-रैंक वाली विदेशी यूनिवर्सिटीज़ के लिए लोकल कैंपस खोलना मुमकिन हुआ है। इसी का नतीजा है कि लगभग 9 यूके इंस्टीट्यूशंस उन विदेशी यूनिवर्सिटीज़ में शामिल हैं जो भारत में कैंपस स्थापित करने की योजना बना रही हैं।
Southampton University (Southampton University) ने दिल्ली में अपना पहला कैंपस खोल भी दिया है, जहां पहले बैच ने पढ़ाई शुरू कर दी है। इसके अलावा Surrey (Surrey), York (York) और Bristol (Bristol) जैसी यूके की अन्य यूनिवर्सिटीज़ भी भारत में नए कैंपस खोलने या स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं।
इन इंटरनेशनल ब्रांच का लक्ष्य यूके के कैंपस की तरह ही डिग्री देना होगा, लेकिन फीस काफी कम होगी। अनुमान है कि यहां फीस £10,000-£12,000 प्रति वर्ष के बीच होगी, जबकि यूके में यह £25,000 से ज़्यादा है। यह स्ट्रेटेजी यूनिवर्सिटीज़ को अपनी इनकम बढ़ाने, डोमेस्टिक वित्तीय जोखिमों को कम करने और तेज़ी से बढ़ते एजुकेशनल मार्केट में अपनी जगह बनाने में मदद करेगी। 2022 में यूके के शिक्षा निर्यात (Education Exports) का मूल्य लगभग £32 बिलियन था, जो इस क्षेत्र के आर्थिक महत्व को दर्शाता है।
चुनौतियाँ भी कम नहीं (The Forensic Bear Case)
हालांकि भारत में विस्तार एक बड़ा मौका है, लेकिन इसमें कई जोखिम भी शामिल हैं। नए इंटरनेशनल कैंपस स्थापित करने के लिए बड़े अपफ्रंट इन्वेस्टमेंट (Upfront Investment) की ज़रूरत होती है और शुरुआत में ये कैंपस घाटे में चल सकते हैं। यूनिवर्सिटीज़ को भारतीय रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (Regulatory Framework) की स्थिरता और लगातार बनी रहने वाली स्टूडेंट डिमांड पर निर्भर रहना होगा, जो स्थानीय नीतियों में बदलाव से प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, अगर इन कैंपस को ठीक से मैनेज न किया जाए, तो यूके की डिग्रीज़ का ब्रांड वैल्यू (Brand Value) या एक्सक्लूसिविटी (Exclusivity) कम हो सकती है। कम्पेटिटिव लैंडस्केप (Competitive Landscape) भी तेज़ हो रहा है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और अन्य देशों की यूनिवर्सिटीज़ भी भारत को टारगेट कर रही हैं।
डोमेस्टिक लेवल पर, 2028 से लगने वाला £925 का लेवी यूनिवर्सिटीज़ पर लागत का बोझ बढ़ाएगा, जिससे घाटा और बढ़ सकता है, खासकर छोटी यूनिवर्सिटीज़ के लिए। यूके की अपनी इंटरनेशनल स्ट्रेटेजी का फोकस ओवरसीज़ विस्तार पर है, जो यह दर्शाता है कि यूके के अंदर इंटरनेशनल स्टूडेंट्स को आकर्षित करना मुश्किल हो रहा है। पोस्ट-स्टडी वर्क वीज़ा में कटौती भी ऐसे संकेत देती है कि यूके, इंटरनेशनल ग्रेजुएट्स के लिए पढ़ाई के बाद रुकने का माहौल उतना वेलकमिंग (Welcoming) नहीं रहा।
आगे क्या? (The Future Outlook)
एनालिस्ट सेंटिमेंट (Analyst Sentiment) के अनुसार, यूके की हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस की वित्तीय स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, और कई को ओवरसीज़ ऑपरेशन्स (Overseas Operations) के ज़रिए इनकम बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इंटरनेशनल कैंपस स्थापित करने की स्ट्रेटेजी को डोमेस्टिक वित्तीय दबावों का सामना करने और ग्लोबल डिमांड का फायदा उठाने के लिए एक ज़रूरी कदम माना जा रहा है।
लेकिन इस स्ट्रेटेजी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे जटिल इंटरनेशनल रेगुलेटरी एनवायरनमेंट्स (Regulatory Environments) को कितनी अच्छी तरह संभाल पाते हैं, भारी अपफ्रंट कॉस्ट (Upfront Cost) को कैसे मैनेज करते हैं, और बदलते जियो-पॉलिटिकल (Geopolitical) और इकोनॉमिक (Economic) परिदृश्य के हिसाब से कैसे एडजस्ट करते हैं। सेक्टर का भविष्य इस बात पर टिका होगा कि वे इन इंटरनेशनल वेंचर्स को यूके के अंदर चल रही वित्तीय और नीतिगत चुनौतियों के साथ कितना संतुलित कर पाते हैं।