तुर्की में Mecca Defence Alliance को लागू करने के सरकारी फैसले पर घमासान छिड़ गया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने संसद की मंजूरी के बिना सेना भेजकर संविधान का उल्लंघन किया है। इस भू-राजनीतिक तनाव से मिडिल ईस्ट में स्थिरता और करेंसी मार्केट पर दबाव बढ़ने का डर है।
विवाद की जड़ क्या है?
7 अगस्त, 2026 को तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए एक डिफेंस पैक्ट के बाद अब राजनीतिक तूफान आ गया है। 5 अक्टूबर, 2026 को रियाद में हुई एक इमरजेंसी बैठक के बाद इस अलायंस को एक्टिव कर दिया गया, जिसका मकसद यमन में हूती हमलों का जवाब देना है। हालांकि, तुर्की सरकार द्वारा संसद की मुहर के बिना यह कदम उठाने से देश की मुख्य विपक्षी पार्टियां, जैसे कि 'न्यू पार्टी' और 'IYI पार्टी', भड़क गई हैं।
संवैधानिक संकट का खतरा
विपक्ष का तर्क है कि यह तैनाती तुर्की संविधान के अनुच्छेद 92 का सीधा उल्लंघन है, जिसके तहत विदेशी सैन्य अभियानों के लिए संसद की मंजूरी अनिवार्य है। विपक्षी नेताओं ने इसे 'संवैधानिक अपराध' करार दिया है। सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि समझौते की शर्तों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे यह साफ नहीं है कि तुर्की की सैन्य प्रतिबद्धता का दायरा कितना बड़ा है।
मार्केट और निवेशकों पर क्या होगा असर?
यह भू-राजनीतिक तनाव निवेशकों के लिए बड़ा सिरदर्द बन सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तुर्की यमन के संघर्ष में सीधे उलझता है, तो इससे क्षेत्रीय सुरक्षा और एनर्जी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है, जिसका असर ग्लोबल ऑयल और गैस की कीमतों पर दिखना तय है।
आने वाले 30 दिनों में सरकार को इस मामले पर जवाब देना होगा। यदि सरकार इसे संसद में पेश नहीं करती है, तो तुर्की की फाइनेंशियल मार्केट और तुर्की लीरा में बड़ी अस्थिरता देखने को मिल सकती है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि सरकार संसद से बैकडेटेड मंजूरी लेती है या अपनी जिद पर कायम रहती है।
