राष्ट्रपति Trump ने साफ किया है कि ईरान को अब परमाणु गतिविधियों के लिए अमेरिका की मंजूरी लेनी होगी। वहीं, 10-11 नवंबर को होने वाली Russia-Ukraine शांति वार्ता पर भी निवेशकों की नजर है, जो ग्लोबल क्रूड ऑयल और भारतीय बाजार की चाल तय कर सकती है।
राष्ट्रपति Trump ने 5 नवंबर, 2026 को स्पष्ट कर दिया है कि ईरान अब अमेरिका की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी परमाणु गतिविधि नहीं कर सकता। इस घोषणा के बाद से पर्शियन गल्फ (Persian Gulf) क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया है, जो दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक प्रमुख केंद्र है। ईरान ने कतर के जरिए अमेरिका को एक प्रस्ताव भेजा है, लेकिन फिलहाल कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। इसी बीच, पूरी दुनिया की नजरें 10-11 नवंबर, 2026 को अबू धाबी में होने वाली अमेरिका, रूस और यूक्रेन की त्रिपक्षीय शांति वार्ता पर टिकी हैं।
क्रूड ऑयल का भारतीय बाजार पर असर
भारतीय निवेशकों के लिए यह घटनाक्रम सीधा ऊर्जा बाजारों से जुड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) तेल परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण रूट है, और वहां तनाव बढ़ने से क्रूड ऑयल की कीमतें भड़क सकती हैं। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है, ऐसे में तेल महंगा होने से देश का इंपोर्ट बिल और ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है। यह स्थिति ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मार्जिन पर दबाव डाल सकती है और महंगाई को बढ़ा सकती है।
अमेरिकी राजनीति और कूटनीति
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद वहां डेमोक्रेट्स का कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हो गया है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे राष्ट्रपति के लिए एकतरफा सैन्य कार्रवाई करना मुश्किल होगा, जिससे कूटनीतिक रास्तों पर जोर बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, मौजूदा माहौल काफी नाजुक बना हुआ है।
निवेशकों के लिए क्या है अहम?
फिलहाल भारतीय निवेशकों को कच्चे तेल की कीमतों और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। अबू धाबी की बातचीत ग्लोबल रिस्क सेंटिमेंट का एक बड़ा बैरोमीटर साबित होगी। जब तक परमाणु वार्ता और क्षेत्रीय सुरक्षा समझौतों पर स्थिति साफ नहीं हो जाती, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रहने के पूरे आसार हैं।
