बदलती दुनिया में नया गठजोड़
दुनिया भर में भू-राजनीतिक बदलावों और अनिश्चितताओं के बीच, थाईलैंड अब भारत के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को गहरा कर रहा है। यह सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि स्थिरता और जोखिम कम करने की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है, जो दोनों देशों के लिए नए अवसर पैदा करेगा।
अमेरिका-चीन की छाया में भारत की ओर झुकाव
अमेरिका और चीन के साथ अपने मौजूदा रिश्तों में बढ़ रही अनिश्चितता को देखते हुए, थाईलैंड अपनी रणनीतिक पसंद को बढ़ाना चाहता है। अमेरिका की नीतियां और चीन की बढ़ती सक्रियता ने बैंकॉक को एक नए विकल्प की तलाश पर मजबूर किया है। ऐसे में, भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और ऐतिहासिक संबंधों के कारण थाईलैंड के लिए एक आकर्षक साझेदार बनकर उभरा है।
यह कदम भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया के साथ संबंधों को मजबूत करना है। अप्रैल 2025 में दोनों देशों के बीच संबंधों को औपचारिक रूप से रणनीतिक साझेदारी तक बढ़ाना इस जुड़ाव को और मजबूत करता है। भारत के लिए, ये रिश्ते उसके 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) लक्ष्य को हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो 2047 तक $30 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है।
मुख्य सेक्टर: चिप्स और AI में सहयोग
सेमीकंडक्टर (Semiconductors) इस साझेदारी का एक प्रमुख केंद्र है। थाईलैंड चिप असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग (ATP) में मजबूत है और अब वह कॉम्प्लेक्स पैकेजिंग और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में आगे बढ़ना चाहता है। दूसरी ओर, भारत चिप डिजाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) में अग्रणी है, जहाँ इंजीनियरों का एक बड़ा पूल मौजूद है। यह डिजाइन को विनिर्माण से जोड़ने का एक साझा रास्ता खोलता है, खासकर बिना भारी निवेश के।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में, थाईलैंड अपनी AI क्षमताओं को विकसित करने के लिए विश्वसनीय साझेदारों की तलाश में है। भारत का बढ़ता AI प्रतिभा पूल, जो 2027 तक 12.5 लाख से अधिक पेशेवरों तक पहुंचने की उम्मीद है, इसमें मदद कर सकता है। भारत का AI बाजार भी 2027 तक $17 बिलियन से अधिक और 2034 तक $13.2 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जिसे सरकारी समर्थन और डिजिटल अपग्रेडेशन से बढ़ावा मिलेगा।
ऑटो सेक्टर और MSME को बढ़ावा
ऑटोमोटिव सेक्टर में भी सहयोग की गुंजाइश है, जिसमें भारत-थाईलैंड-जापान का संयुक्त ढांचा प्रस्तावित है। थाईलैंड वैश्विक विनिर्माण केंद्र है, जबकि भारत में एडवांस्ड व्हीकल टेक्नोलॉजी पर केंद्रित कई ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) हैं। थाईलैंड के इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की ओर बढ़ने में भारत की बैटरी सिस्टम और चार्जिंग में विशेषज्ञता काम आ सकती है। हालांकि, थाई ऑटो सेक्टर 2025 में शेयर कीमतों में गिरावट का सामना कर चुका है।
छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों (MSMEs) के लिए, ग्लोबल सप्लाई चेन में शामिल होना महत्वपूर्ण है। भारतीय कंपनियाँ डिजाइन और टूलिंग में मजबूत हैं, जबकि थाई फर्म सटीक असेंबली और टेस्टिंग में कुशल हैं। यह सहयोग थाईलैंड की 'थाईलैंड 4.0' रणनीति को बढ़ावा देगा और चीन-जापान निर्माण नेटवर्क पर निर्भरता कम करेगा।
जोखिम और चुनौतियाँ
हालांकि, इस साझेदारी में कुछ जोखिम भी हैं। थाईलैंड की अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा में फंसने की संभावना बनी हुई है। भारत पर अत्यधिक निर्भरता भी एक चिंता का विषय है, क्योंकि भारत की विनिर्माण क्षमता अभी भी विकसित हो रही है और उसे R&D निवेश तथा प्रतिभा को बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
