13 सितंबर 2026 को हुए स्वीडन के आम चुनावों में कांटे की टक्कर देखने को मिली है। 349 सीटों वाली संसद 'Riksdag' में राइट-विंग और सेंटर-लेफ्ट गठबंधन के बीच मुकाबला बराबरी पर है, जिससे सरकार गठन को लेकर सस्पेंस बना हुआ है।
स्वीडन में 13 सितंबर 2026 को हुए संसदीय चुनावों के नतीजों ने नॉर्डिक देश में राजनीतिक अनिश्चितता का दौर शुरू कर दिया है। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री Ulf Kristersson की अगुवाई वाली मौजूदा राइट-विंग सरकार और Magdalena Andersson के नेतृत्व वाले सेंटर-लेफ्ट विपक्ष के बीच फासला बेहद कम है। सेंटर-लेफ्ट गठबंधन को 175 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि मौजूदा सरकार को 174 सीटें मिलती दिख रही हैं। हालांकि, अंतिम तस्वीर विदेशी मतपत्रों (overseas ballots) की गिनती पूरी होने के बाद ही साफ होगी।
राजनीतिक अस्थिरता का इकोनॉमिक असर
ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए सबसे बड़ी चिंता सरकार बनाने में होने वाली देरी है। किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की तरह, स्वीडन में भी बिजनेस कॉन्फिडेंस के लिए पॉलिसी स्टैबिलिटी बेहद जरूरी है। यदि संसद 'हंग' रहती है या गठबंधन बनाने में लंबा वक्त लगता है, तो बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग जैसे बड़े फैसलों में देरी हो सकती है। इसका सीधा असर स्वीडिश क्रोना (SEK) में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश (FDI) पर पड़ सकता है।
माइग्रेशन पॉलिसी और लेबर मार्केट पर नजर
यह चुनाव माइग्रेशन नियमों पर एक बड़े जनमत संग्रह की तरह रहा है। पिछले 4 वर्षों में सरकार ने परमानेंट रेजीडेंसी और वेलफेयर नियमों को काफी कड़ा किया है। इन नियमों में कोई भी बड़ा बदलाव टेक और इंजीनियरिंग जैसे उन सेक्टरों को प्रभावित कर सकता है जो अंतरराष्ट्रीय टैलेंट पर निर्भर हैं।
जोखिम और निगरानी
फिलहाल देश में 'प्रशासनिक पंगुता' (administrative paralysis) का बड़ा जोखिम है। यदि कोई भी पक्ष स्पष्ट बहुमत नहीं जुटा पाता, तो आर्थिक सुधारों को लागू करना कठिन हो जाएगा। इसके अलावा, Sweden Democrats जैसी पार्टी के गठबंधन में शामिल होने की संभावना ने राजनीतिक मानदंडों को लेकर बहस छेड़ दी है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीडन की छवि पर भी पड़ सकता है। फिलहाल, मार्केट की नजरें विदेशी मतपत्रों की गिनती पर टिकी हैं, जो इस हफ्ते के मध्य तक पूरी होने की उम्मीद है।
