वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया संकट: हॉजपॉच और ऊंची कीमतों का दोहरा वार
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का अप्रत्यक्ष रूप से वाणिज्यिक शिपिंग के लिए बंद होना और कच्चे तेल की कीमतों का $90 प्रति बैरल से ऊपर जाना, वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े झटके का संकेत है। पहले जहाँ बाजारों में इस तनाव के प्रति शुरुआती शांति दिख रही थी, वहीं अब यह स्थिति नाजुक साबित हो रही है। यह केवल एक अस्थायी भू-राजनीतिक प्रीमियम नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा बाजारों को सक्रिय रूप से पुनर्मूल्यांकित कर रहा है और केंद्रीय बैंकों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है। MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स अपने हालिया शिखर से पहले ही $1 ट्रिलियन से अधिक मार्केट कैपिटलाइजेशन गंवा चुका है, जो बाजारों में बढ़ती जोखिम से बचने की भावना को दर्शाता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: सप्लाई का चोकपॉइंट बना, महंगाई और स्टैगफ्लेशन का खतरा बढ़ा
दुनिया भर में ऊर्जा की सप्लाई के लिए एक महत्वपूर्ण धमनी माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। टैंकरों का ट्रैफिक 90% से अधिक घट गया है, और लगभग 200 टैंकर फंसे हुए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, करीब 3,000 जहाज और 20,000 नाविक इस व्यवधान से प्रभावित हुए हैं, जिनमें हालिया एक घटना में 4 नाविकों की जान भी चली गई। यह सिर्फ एक संभावित खतरा नहीं, बल्कि आज की वास्तविकता है, जिसके चलते इराक के कुछ तेल क्षेत्रों को स्टोरेज की कमी के कारण उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है। इस सीधे सप्लाई झटके ने ब्रेंट क्रूड की कीमतों को $90 प्रति बैरल से ऊपर धकेल दिया है। कतर का अनुमान है कि यदि स्थिति ऐसे ही बनी रही तो कीमतें $150 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, और अगर यह व्यवधान लंबा खिंचता है तो यह $180-$200 प्रति बैरल तक भी जा सकती हैं। कीमतों में यह भारी उछाल वैश्विक महंगाई को 2-4% तक बढ़ा सकता है और ऊर्जा आयात पर निर्भर विकासशील देशों में 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) के दबाव को और गंभीर कर सकता है।
भारत पर सीधा असर: रुपया कमजोर, करंट अकाउंट घाटा बढ़ने का डर, IT सेक्टर पर भी असर
भारत, जो अपनी क्रूड ऑयल सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है, इस संकट के कारण काफी कमजोर पड़ गया है। तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के माहौल के चलते भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 92.18 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो भारत के चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) में वृद्धि हो सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है, जो फिलहाल $700 बिलियन से अधिक है, लेकिन फिर भी दबाव में आ सकता है। महंगाई के खिलाफ मिली सफलताओं पर भी खतरा मंडरा रहा है; कच्चे तेल की कीमतों में 10% की वृद्धि से महंगाई दर 30 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकती है। इसके अलावा, केमिकल और एयरलाइंस जैसे कच्चे माल पर निर्भर उद्योग अपने मार्जिन पर दबाव महसूस कर सकते हैं। भारतीय आईटी सेक्टर, जिसका सीधे तौर पर संघर्ष क्षेत्र से अधिक जुड़ाव नहीं है, उसे भी अप्रत्यक्ष रूप से बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष और तेल की ऊंची कीमतें अमेरिका और यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों में वैश्विक आर्थिक वृद्धि को धीमा कर सकती हैं, जिससे भारतीय आईटी कंपनियों के लिए विवेकाधीन खर्च कम हो सकता है और प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है। निफ्टी आईटी इंडेक्स में लगभग 1.1% की गिरावट इसी चिंता को दर्शाती है।
फेडरल रिजर्व की मुश्किल: रेट कट की उम्मीदों पर ग्रहण, महंगाई का बढ़ता बोझ
ऊंची तेल कीमतों का यह उछाल अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है, जिससे उनके द्वारा नियोजित ब्याज दरों में कटौती की योजना टल सकती है या धीमी हो सकती है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि तेल की कीमतों में $10 की वृद्धि अमेरिकी कोर इन्फ्लेशन को लगभग 0.1% तक बढ़ा सकती है। पहले से ही फेड के 2% के लक्ष्य से ऊपर चल रही महंगाई के इस नए दबाव के कारण, बाजार अब केंद्रीय बैंक की ब्याज दरें घटाने की उम्मीदों पर फिर से विचार कर रहे हैं। फेडरल रिजर्व के कई अधिकारियों ने भी इस पर चिंता जताई है। क्लीवलैंड फेड की अध्यक्ष बेथ हैमैक ने कहा है कि यदि महंगाई अपने लक्ष्य की ओर नहीं लौटी तो नीति को और सख्त करना पड़ सकता है। कुछ का मानना है कि यह तेल मूल्य वृद्धि एक अस्थायी झटका है, जबकि अन्य को डर है कि यह महंगाई की उम्मीदों को अनियंत्रित कर सकता है और ऊंची ब्याज दरों का दौर लंबा खींच सकता है।
संरचनात्मक कमजोरियां और अनिश्चित रिकवरी: क्या इतिहास दोहराएगा?
जबकि ऐतिहासिक डेटा बताता है कि मध्य पूर्व के संघर्षों के बाद बाजार अक्सर एक साल के भीतर ठीक हो जाते हैं, वर्तमान स्थिति कुछ अलग संरचनात्मक जोखिम प्रस्तुत करती है। होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी, पिछली घटनाओं की तुलना में, आपूर्ति में एक अधिक गंभीर और प्रत्यक्ष व्यवधान है। मौजूदा बाइपास पाइपलाइन की क्षमता आपूर्ति में आई कमी को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है, जो केवल 20% से कम खोए हुए वॉल्यूम को कवर कर सकती है। इससे एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहां तेल की कीमतें हफ्तों या महीनों तक ऊंची बनी रहें, जिससे 'स्टैगफ्लेशन' का लंबा दौर चलेगा और यदि यह बंद तीन महीने तक बना रहा तो वैश्विक जीडीपी वृद्धि 1.5-3.0% तक कम हो सकती है। भारत के लिए, मध्य पूर्व से ऊर्जा आयात पर निर्भरता और बढ़ते आयात बिल के कारण, यह स्थिति लगातार मूल्य झटके और मुद्रा में गिरावट के प्रति विशेष रूप से खतरनाक है। फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों में कटौती की राह में संभावित देरी, जो महंगाई के डर से प्रेरित है, उभरते बाजारों के लिए जोखिम को और बढ़ा सकती है और वैश्विक आर्थिक सुधार को धीमा कर सकती है, जो आईटी जैसे सेक्टरों को प्रभावित करेगा जो विवेकाधीन खर्च पर निर्भर करते हैं। संघर्ष की अवधि और प्रमुख शिपिंग मार्गों की स्थिति महत्वपूर्ण कारक बनी रहेगी, और किसी भी लंबे व्यवधान से सभी परिसंपत्ति वर्गों में जोखिम की धारणा पूरी तरह से बदल सकती है।