श्रीलंका सरकार ने भारत में रह रहे लगभग **90,000** तमिल शरणार्थियों की स्वैच्छिक वापसी के लिए एक औपचारिक मैकेनिज्म तैयार किया है। इस नई नीति के तहत, गृहयुद्ध के दौरान पलायन करने वाले लोग अपनी पहचान सत्यापित कर बिना किसी कानूनी डर के वापस लौट सकेंगे।
श्रीलंका सरकार ने उन तमिल शरणार्थियों के लिए एक व्यवस्थित ढांचा लॉन्च किया है, जिन्होंने गृहयुद्ध के दौरान भारत में शरण ली थी। कैबिनेट द्वारा मंजूर की गई यह नीति उन लोगों की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करती है, जो बिना वैध दस्तावेजों के सीमा पार कर गए थे। इस पहल का मुख्य उद्देश्य तमिलनाडु के कैंपों में दशकों से रह रहे शरणार्थियों को एक सम्मानजनक वापसी का अवसर देना है।
कानूनी सुरक्षा और पहचान प्रक्रिया
नई गाइडलाइन्स के तहत, मई 2009 से पहले देश छोड़ने वाले व्यक्ति 'इमिग्रेशन एंड इमिग्रेशन एक्ट 1948' के तहत किसी भी कानूनी कार्रवाई के बिना स्वदेश वापसी के लिए आवेदन कर सकते हैं। आवेदकों को भारत में स्थित श्रीलंकाई दूतावासों के जरिए अपनी राष्ट्रीयता प्रमाणित करनी होगी, जिसके बाद उन्हें अस्थायी पासपोर्ट और कानूनी प्रवेश की अनुमति मिलेगी।
सुरक्षा जांच और चुनौतियां
वापसी का पूरा प्रोसेस रक्षा मंत्रालय की देखरेख में होगा। स्टेट इंटेलिजेंस सर्विस द्वारा सभी आवेदकों की अनिवार्य सुरक्षा जांच की जाएगी, ताकि गंभीर अपराधों में शामिल व्यक्तियों को बाहर रखा जा सके।
हालांकि, सरकार की इस पहल के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। भारत में जन्मे युवाओं के लिए अपनी जड़ों से फिर से जुड़ना और वहां के लेबर मार्केट में अपनी शैक्षणिक डिग्रियों को मान्य कराना एक कठिन प्रक्रिया हो सकती है। इसके अलावा, भारत, श्रीलंका और UNHCR के बीच त्रिपक्षीय समझौते के अभाव में, पूरी प्रक्रिया अभी मुख्य रूप से द्विपक्षीय समन्वय पर टिकी हुई है।
